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40% गिरा भारत का रूसी तेल आयात, चीन ने बनाया रिकॉर्ड

 
40% गिरा भारत का रूसी तेल आयात, चीन ने बनाया रिकॉर्ड
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Mumbai : रूस-यूक्रेन युद्ध और अमेरिका-यूरोप के सख्त प्रतिबंधों के बीच वैश्विक कच्चे तेल बाजार में बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। भारत ने अमेरिकी दबाव, टैरिफ जोखिम और ट्रेड डील के तहत रूसी कच्चे तेल की खरीद में भारी कटौती की है, जबकि चीन इस अवसर का भरपूर फायदा उठा रहा है। रूस और ईरान से सस्ते तेल की भारी खरीद से चीन अपने भंडार बढ़ा रहा है, जिससे एशियाई बाजार में रूसी तेल की प्रतिस्पर्धा कम हुई है।

भारत की खरीद में 40% तक गिरावट 

ऊर्जा रिसर्च फर्म Rystad Energy के अनुसार, जनवरी की तुलना में भारत का रूसी तेल आयात फरवरी में लगभग 40% घटकर करीब 6 लाख बैरल प्रतिदिन (bpd) रह सकता है। Bloomberg और Reuters की रिपोर्ट्स से पता चलता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों (Rosneft और Lukoil पर) और ट्रंप प्रशासन के टैरिफ दबाव के कारण भारतीय रिफाइनरियां (जैसे Indian Oil, Bharat Petroleum, Reliance) ने रूसी क्रूड खरीद रोक दी है। जनवरी में भारत ने औसतन 1.1 मिलियन bpd खरीदा था, जो 2025 के औसत 1.7 मिलियन bpd से काफी कम है। फरवरी में भी गिरावट जारी है, हालांकि कुछ रिकवरी की उम्मीद है, लेकिन मार्च से और तेज कमी की संभावना है।

चीन को रिकॉर्ड लाभ: रूसी तेल आयात नया उच्च स्तर पर  

Kpler और Vortexa Analytics के वेसल ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, फरवरी के पहले 18 दिनों में चीन के बंदरगाहों पर रूसी तेल की आवक 2.09 मिलियन bpd पहुंच गई, जो जनवरी से 20% अधिक और दिसंबर से लगभग दोगुनी है। पूरे फरवरी में अनुमान 2.07-2.083 मिलियन bpd है, जो नया रिकॉर्ड है। भारत की कमी से रूसी Urals ग्रेड तेल अब ICE ब्रेंट से $9-12 प्रति बैरल सस्ता मिल रहा है, जिसका फायदा चीन की 'टीपॉट' (निजी) रिफाइनरियों को मिल रहा है।

ईरान से भी चीन आयात कर रहा है, लेकिन फरवरी में यह घटकर औसतन 1.03-1.138 मिलियन bpd रह गया (जनवरी से 12% कम)। ईरानी Light क्रूड भी ब्रेंट से $11 तक सस्ता है, लेकिन रूसी तेल की तुलना में जोखिम अधिक होने से चीन ने रूस की ओर रुख किया। ईरानी तेल का फ्लोटिंग स्टोरेज बढ़कर 48 मिलियन बैरल पहुंच गया (फरवरी शुरू में 33 मिलियन था)।

वैश्विक असर और भविष्य 

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की दूरी और चीन की भारी खरीद से एशियाई ऊर्जा बाजार का संतुलन बदल रहा है। रूसी तेल एशियाई जल में जमा हो रहा है (रूस से 9.5 मिलियन बैरल फ्लोटिंग), जिससे रूस और ईरान को और डिस्काउंट देना पड़ रहा है। इससे वैश्विक तेल कीमतों, शिपिंग रूट्स और भू-राजनीतिक समीकरण प्रभावित हो सकते हैं। भारत अब सऊदी, अमेरिकी और अन्य स्रोतों की ओर मुड़ रहा है, लेकिन इससे उसकी लागत बढ़ सकती है।