पश्चिम एशिया संकट का असर: कच्चे तेल ने छुआ 100 डॉलर का स्तर, भारत में महंगाई बढ़ने की आशंका
New Delhi : पश्चिम एशिया में जारी तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की लगातार बढ़ती कीमतों को लेकर है। ब्रेंट क्रूड ऑयल 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर चुका है, जिससे भारत समेत तेल आयात पर निर्भर देशों की चिंताएं बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ महंगाई पर भी दबाव बढ़ सकता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री मनोरंजन शर्मा के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Hormuz Strait) में उत्पन्न बाधाओं ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया है। यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में शामिल है और भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से पूरा करता है।
उन्होंने बताया कि भारत के कुल आयातित कच्चे तेल का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ता है।
67 डॉलर से 100 डॉलर तक पहुंचा कच्चा तेल
विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से पहले कच्चे तेल की कीमतें 67-68 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थीं। लेकिन हालात बिगड़ने के साथ इसमें तेजी आई और अब ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया है। वहीं स्पॉट मार्केट में कीमतें 120 से 130 डॉलर प्रति बैरल तक दर्ज की जा रही हैं।
ऊर्जा बाजार के जानकार इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर संकेत मान रहे हैं, क्योंकि तेल की कीमतों में वृद्धि का असर परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत पर पड़ता है।
पेट्रोल-डीजल महंगा होने की आशंका
कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा प्रभाव पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे खाद्य सामग्री, फल, सब्जियां और अन्य आवश्यक वस्तुएं भी महंगी हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो आम लोगों के घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है और महंगाई दर में भी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
सरकार के लिए बढ़ी चुनौती
वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच सरकार के सामने आम जनता को राहत देने की चुनौती भी बढ़ गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि लंबे समय तक बढ़ी हुई लागत को सरकार या तेल कंपनियां अपने स्तर पर वहन नहीं कर सकतीं। यही कारण है कि हाल के सप्ताहों में ईंधन की कीमतों में क्रमिक वृद्धि देखने को मिली है।
नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऐसे वैश्विक झटकों से बचने के लिए भारत को नवीकरणीय ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर अधिक निवेश करना होगा। उन्होंने कहा कि देश इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और कुल ऊर्जा उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। हालांकि आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में अभी समय लगेगा।
