चार बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, CRISIL ने दी चेतावनी; आम आदमी पर बढ़ सकता है महंगाई का बोझ
New Delhi : पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में जारी भू-राजनीतिक तनाव का असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हाल के दिनों में लगातार हुई बढ़ोतरी को लेकर रेटिंग एजेंसी CRISIL ने चेतावनी दी है कि इससे देश में महंगाई का नया दबाव पैदा हो सकता है। एजेंसी के अनुसार आने वाले महीनों में परिवहन और विनिर्माण लागत बढ़ने का असर सीधे उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर देखने को मिल सकता है।
चार बार बढ़े ईंधन के दाम
पिछले कुछ दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगातार चार बार वृद्धि की गई है।
- 15 मई: पेट्रोल-डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी।
- 19 मई: लगभग 90 पैसे प्रति लीटर की वृद्धि।
- 23 मई: पेट्रोल 87 पैसे और डीजल 91 पैसे महंगा।
- 25 मई: पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये महंगा।
इन बढ़ोतरी के बाद दोनों ईंधनों की कीमतों में कुल मिलाकर करीब 7.5 रुपये प्रति लीटर का इजाफा हो चुका है।
10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है बढ़ोतरी
CRISIL की रिपोर्ट के मुताबिक, तेल विपणन कंपनियां अपने बढ़ते नुकसान की भरपाई कर रही हैं। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो पेट्रोल-डीजल की कुल बढ़ोतरी 10 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, ईंधन की कीमतों में वृद्धि का उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महंगाई पर सीधा असर पड़ सकता है। वर्तमान बढ़ोतरी से महंगाई में करीब 36 बेसिस पॉइंट का प्रभाव पड़ने का अनुमान है, जबकि 10 रुपये प्रति लीटर तक वृद्धि होने पर यह प्रभाव बढ़कर 48 बेसिस पॉइंट तक पहुंच सकता है।
परिवहन क्षेत्र पर सबसे अधिक असर
भारत में करीब 71 प्रतिशत माल ढुलाई सड़क परिवहन के जरिए होती है। इस क्षेत्र में ईंधन लागत कुल परिचालन खर्च का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा होती है। ऐसे में डीजल-पेट्रोल महंगा होने से माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स की लागत बढ़ेगी, जिसका असर सप्लाई चेन पर पड़ेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर डेयरी उत्पादों, फल-सब्जियों, दालों, मसालों, चाय, कॉफी, अंडे, मांस और मछली जैसी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है, क्योंकि इनकी आपूर्ति बड़े पैमाने पर परिवहन पर निर्भर करती है।
कोर महंगाई पर भी बढ़ेगा दबाव
बढ़ती ईंधन लागत का असर केवल खाद्य वस्तुओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कोर महंगाई पर भी दबाव बढ़ेगा। कच्चे तेल, गैस और परिवहन खर्च बढ़ने से कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, लकड़ी, सीमेंट और सिरेमिक जैसे क्षेत्रों में भी उत्पादन लागत बढ़ सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मांग स्थिर रहने की स्थिति में कंपनियां या तो उत्पादों की कीमतें बढ़ा सकती हैं या फिर ‘श्रिंकफ्लेशन’ का सहारा ले सकती हैं। इसमें उत्पाद का आकार या मात्रा कम कर दी जाती है, जबकि कीमत पहले जैसी रखी जाती है।
कच्चे तेल की ऊंची कीमतें बनीं चिंता
CRISIL के अनुसार चालू वित्त वर्ष के शुरुआती दो महीनों में कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 112 डॉलर प्रति बैरल रही है, जो अनुमानित 95 डॉलर प्रति बैरल से काफी अधिक है। यही वजह है कि महंगाई को लेकर चिंता बढ़ रही है और आने वाले महीनों में उपभोक्ताओं पर इसका अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
