क्या आपका बच्चा भी मोबाइल का आदी हो रहा है? रिसर्च में चौंकाने वाले खुलासे
New Delhi : स्मार्टफोन और डिजिटल स्क्रीन के बढ़ते इस्तेमाल ने बच्चों की मानसिक सेहत को लेकर माता-पिता की चिंता बढ़ा दी है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बड़ी संख्या में अभिभावक मानते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों के व्यवहार, सीखने की क्षमता और सामाजिक कौशल पर नकारात्मक प्रभाव डाल रहा है। खासतौर पर सोशल मीडिया, ऑनलाइन सुरक्षा और गैजेट्स की लत को लेकर चिंताएं तेजी से बढ़ रही हैं।
स्क्रीन में उलझते बच्चे, वास्तविक दुनिया से दूरी
स्वास्थ्य और विज्ञान पत्रकार कैथरीन प्राइस का कहना है कि लगातार स्क्रीन में डूबे रहने से बच्चे वास्तविक जीवन के अनुभवों से कटते जा रहे हैं। वे न तो व्यावहारिक कौशल सीख पा रहे हैं और न ही आमने-सामने संवाद करना सीख रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वजह है कि अब स्क्रीन टाइम को लेकर गंभीर नीति और पारिवारिक स्तर पर अनुशासन जरूरी हो गया है।
रिसर्च आधारित समाधान की जरूरत
कैथरीन प्राइस और ‘द एंग्जायस जेनरेशन’ के लेखक जोनाथन हैट ने इस मुद्दे पर गहन अध्ययन किया है। उनकी पुस्तक The Amazing Generation: Your Guide to Fun and Freedom in a Screen-Filled World में माता-पिता के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं, जो वैश्विक स्तर पर लागू हो सकते हैं।
माता-पिता को बनना होगा आदर्श
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की आदतें बदलने के लिए माता-पिता को पहले खुद उदाहरण पेश करना होगा। अगर अभिभावक स्वयं फोन पर ज्यादा समय बिताते हैं, तो बच्चों से संयम की उम्मीद करना मुश्किल होगा। कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते हैं कि बच्चों को अधिकार दिया जाए कि वे जरूरत से ज्यादा स्क्रीन इस्तेमाल करने पर माता-पिता को टोक सकें।
अलग स्मार्टफोन के बजाय ‘फैमिली फोन’ पर जोर
कम उम्र में बच्चों को व्यक्तिगत स्मार्टफोन देने के बजाय परिवार के लिए एक साझा फोन रखने की सलाह दी गई है। इससे बच्चे समझेंगे कि फोन केवल आवश्यकता का साधन है, न कि हर समय इस्तेमाल की वस्तु। साथ ही, लैंडलाइन या साधारण फोन के उपयोग से संवाद कौशल बेहतर हो सकता है।
स्मार्टफोन की जिम्मेदारी बच्चों पर
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों को स्मार्टफोन देने में देरी बेहतर है। यदि संभव हो तो उन्हें खुद के पैसों से फोन खरीदने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, ताकि वे उसकी कीमत और जिम्मेदारी समझें। इससे उनमें मेहनत और धैर्य जैसे गुण भी विकसित होंगे।
विशेषज्ञों का कहना है कि तकनीक से पूरी तरह दूरी बनाना संभव नहीं है, लेकिन स्पष्ट नियम और सीमाएं तय करना जरूरी है। यदि माता-पिता समझदारी से स्क्रीन टाइम नियंत्रित करें और स्वयं अनुशासन का पालन करें, तो बच्चे पढ़ाई, खेल और वास्तविक दुनिया की गतिविधियों में बेहतर तरीके से शामिल हो सकते हैं।
