US tariff: अमेरिकी टैरीफ की भार, भारत है कितना तैयार
मिथिलेश कुमार पाण्डेय (लेखक पूर्व सहायक महाप्रबंधक, बैंक ऑफ बड़ौदा एवं आर्थिक विश्लेषक हैं)
US tariff: वैश्वीकरण के दौर में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार अपरिहार्य है l वैश्विक समृद्धि को ध्यान में रखकर व्यापार के लिए देशों की भौगौलिक सीमाओं को अव्यवहारिक बनाया गया था ताकि उत्पाद को बाज़ार मिले और विश्व के बड़े भूभाग में स्थित आबादी को उच्च गुणवत्ता वाला सामान सस्ते दरों पर प्राप्त हो सके l
संसार की भौगोलिक स्थिति, प्राकृतिक संसाधनों की उप्लब्द्धता, संसाधनों के दोहन और उत्पादन की तकनिकी क्षमता, उत्पाद के लिए बाज़ार, सप्लाई चेन आदि असमान रूप से वितरित हैं l इस हालत में किसी भी देश का आयात और निर्यात एकदम बराबर नहीं हो सकते है। अतः व्यापारिक असंतुलन अवश्यम्भावी है l
व्यापारिक घाटा किसी भी देश के लिए अच्छा नहीं है जिसके परिणामस्वरूप हर एक देश का प्रयास होता है कि व्यापार घाटे की स्थिति से बचा जाय l व्यापार घाटे को कम करने के लिए आवश्यक है कि निर्यात को बढ़ाया जाय और आयात को कम किया जाय l आयात को कम करने के लिए जरुरी है कि स्वदेशी उत्पादन को बढ़ाया जाय और आयातित वस्तुयों को महंगा कर दिया जाय l संसार के सभी देशों को यह अधिकार है कि वे अपनी अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर अंतर्राष्ट्रीय व्यापार नीति बनाकर उसपर अमल करें l
अमेरिका आज दुनिया की सबसे बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्था है जिसकी सकल घरेलु उत्पाद विश्व में सर्वाधिक 30,50,000 करोड़ डॉलर है और व्यापार घाटा 12,400 करोड़ डॉलर से ज्यादा है l अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अपने पहले कार्यकाल में “ अमेरिका फर्स्ट “ नीति के तहत व्यापार घाटे को कम करने का प्रयास किया था और अपने दुसरे कार्यकाल में कुछ ज्यादा ही आक्रामक ढंग से MAGA ( मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) अभियान को आगे बढ़ा रहे हैं l अपने देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए आयात शुल्क को सहारे देश की आमदनी को बढाने के साथ साथ घरेलु उद्योगों को मजबूत करने का प्रयास कर रहे है l
अपने दुसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही IEEPA ( इंटरनेशनल इमरजेंसी इकनोमिक पावर्स एक्ट) के तहत 10% का बेसलाइन टैरिफ लागु किया और जिन देशों से व्यापारिक घाटा ज्यादा है उनपर उच्च दर का पारस्परिक टैरिफ लगाया l ऐसा प्रतीत होता है कि ट्रम्प प्रशासन टैरिफ को केवल अमेरिकी व्यापार घाटे को नियंत्रित करने के लिए ही नहीं बल्कि व्यापार को अन्य कुटनीतिक मामलों के लिए हथियार की तरह प्रयोग कर रहे हैं l चीन, भारत, कनाडा, ब्राज़ील आदि बड़े देशों के प्रति उनका आक्रामक रवैया व्यापारिक से ज्यादा व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति का प्रयास प्रतीत होता है l
अमेरिका ने भारत पर 25% tariff लगाया और रूस से तेल खरीदने के कारण 25% अतिरिक्त टैरिफ की घोषणा कर दी है जिसके परिणामस्वरूप कुछ अपवादों को छोड़कर भारत से अमेरिका में आयात होने वाले वस्तुओं पर 50% टैरिफ लगेगा l 50% का टैरिफ निश्चित रूप से भारत के लिए चिंता का विषय है और इसके दुस्प्रभाव को रोकने के लिए भारत सरकार को काफी कुछ करने की जरुरत होगी l आइये इस टैरिफ के कारण होनेवाले नुकशान और इससे बचने के लिए भारत सरकार के संभावित विकल्प और उसके सापेक्ष सरकार की तैयारी की चर्चा करते हैं l
अमेरिका द्वारा घोषित tariff ( 25% , 50%) भारत द्वारा निर्यात किये जानेवाले सभी वस्तुओं पर सामान रूप से नहीं है l खास करके वस्त्र परिधान, रत्न आभूषण, ऑटो कॉम्पोनेन्ट आदि वस्तुओं पर 50% का टैरिफ होगा जबकि दवाईयां, जेनेरिक दवाईयां, स्मार्टफोन जैसे कुछ सेक्टरों को शुरुआती छुट मिली है l धारा 232 के अंतर्गत स्टील – अल्लुमिनियम पर पहले से ही ऊँची दरे लागु थी l अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार ( निर्यात) भागीदार बना हुआ है l 2024-25 में द्विपक्षीय व्यापार लगभग 13,200 करोड़ डॉलर था l 2023- 24 में भी अमेरिका भारत के निर्यात का शीर्ष गंतव्य था जहाँ कुल निर्यात का लगभग 18% गया था l भारत से अमेरिका को निर्यात में लगभग 75% से कुछ ज्यादा वस्तुओं के निर्यात की हिस्सेदारी है जबकि शेष सेवाओं का निर्यात है l
स्टैण्डर्ड एंड पूअर के आंकड़ों के अनुसार भारत का अमेरिका को निर्यात भारत के सकल घरेलु उत्पाद का लगभग 2-3% है इसलिए इस tariff का सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव सिमित रहेगा परन्तु कुछ सेक्टर जैसे वस्त्र/परिधान, रत्न/आभूषण, ऑटो पार्ट्स, स्टील-अल्लुमिनियम आदि को परेशानी ज्यादा होगी l उद्योग संस्थायों के आंकड़ो के मुताबिक भारत से वस्त्र/परिधान निर्यात का लगभग 33% हिस्सा अमेरिका को जाता है l अतः लुधियाना, सूरत, तिरुपुर, नॉएडा जैसे क्लस्टर पर त्वरित दबाव दिखेगा l रत्न/आभूषण पर 50% टैरिफ के कारण गुजरात –सूरत- मुंबई क्लस्टर पर भारी दबाव रहेगा l
हालिया रिपोर्ट के अनुसार इन क्षेत्रों के आर्डर बुक पर प्रतिकूल प्रभाव दिखने लगे हैं जिसके कारण रोजगार प्रभावित होंगे l ACMA (ऑटोमोटिव कॉम्पोनेन्ट मैनुफच्चार एसोसिएशन ) के आंकड़ों के अनुसार 24-25 में ऑटो कंपोनेंट्स निर्यात का लगभग 27% हिस्सा अमेरिका को गया था l अतिरिक्त tariff के कारण इनके दाम अब प्रतिस्पर्द्धी नहीं रहेंगे जिसके कारण यह क्षेत्र ज्यादा परेशान होगा l स्पष्ट है कि इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर कम होंगे, तत्काल छटनी हो सकती है l
भारत एक बड़ा बाज़ार है और दुनिया के उत्पादों के लिए सबसे बड़ा अवसर प्रदान करता है जिसके कारण अमेरिका के अतिरिक्त विश्व के दुसरे देश भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को मजबूत बनायेंगे जिससे भारतीय उत्पादों को वैकल्पिक अवसर प्रदान करेंगे और tariff के कारण भारत पर पड़ा दुस्प्रभाव अल्पकालिक होगा l
ट्रम्प के tariff के अपरिहार्य दुस्स्प्रभाव से बचने के लिए भारत को निश्चित ही कुछ विशेष तैयारी करनी होगी और स्पस्टतह भारत कर भी रहा है l ट्रम्प के मनमानी के आगे झुका नहीं जा सकता है क्योंकि भारत को अपने देश की आर्थिक सुरक्षा को सर्वोपरि स्थान देना ही होगा l भारत को कुछ नीतिगत फैसले लेकर तत्काल कार्यरूप में बदलना होगा जिसमेसे कुछ निन्म्वत हैं :
- उद्योग विशेष रिलीफ पैकेज : RoSCTL ( Rebate of State and Central Taxes and Lavies ) और RoDTEP ( Remission of Duties एंड Taxes on Exported Products ) के दरों में संशोधन करके, निर्यात ऋण का विस्तार, अनुदान आदि के माध्यम से निर्यातकों को त्वरित सहायता पहुचाना होगा l
- विश्व व्यापार संगठन (WTO) का सहारा और अन्य उपलब्ध क़ानूनी मार्ग के लिए तैयार रहना l टैरिफ की धारा 232 पर WTO ने 2022 में अमेरिका के खिलाफ फैसला दिया था , हालाँकि अमेरिका ने उसे नहीं माना था फिर भी ताजा उपायों पर क़ानूनी चुनौती देने के लिए भारत को क़ानूनी रणनीति तैयार रखना चाहिए l
- आर्डर डायवर्सन के लिए मध्य पूर्व, यूरोप, लैटिन अमेरिका, अफ्रीका आदि देशों में रोड शो के माध्यम से वैकल्पिक बाज़ार तैयार करना होगा l
- यूनाइटेड किंगडम के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के ही तरह अन्य देशों/संगठनों से भी व्यापार समझौता किया जाना चाहिए l
- सीमा शुल्क, परिवहन लागत, पोर्ट चार्जेज, अनुपालन लागत आदि को कम करके निर्यातकों की आय को बेहतर बनाया जाना चाहिए l
- वैल्यू चेन रिडिजाइन के लिए नियर शोरिंग, फ्रेंड शोरिंग के सहारे टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सकता है l
- उत्पादन लिंक्ड प्रोत्साहन योजना, क्लस्टर नीति का पुनर्मूल्यांकन करके घरेलु इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, तकनिकी उन्नयन, टैक्स क्रेडिट, आरंभिक पूंजी आदि के सहारे निर्यात की लागत को कम करके निर्यातकों को सहारा दिया जा सकता है l
- सेवायों और डिजिटल व्यापार को बढ़ावा देकर माल निर्यात पर निर्भरता कम की जा सकती है जिसके लिए आईटी, हेल्थ केयर, फार्मा क्लिनिकल, डिजाईन R&D क्षेत्र पर जोर दिया जा सकता है l
- स्वदेशी को अपना कर तथा वैकल्पिक उर्जा के प्रयोग के सहारे देश के आयात बिल को कम किया जा सकता है जिससे व्यापार संतुलन का प्रबंधन आसानी से हो सके l
50% अमेरिकी tariff से भारतीय अर्थव्यवस्था के समग्र स्तर पर सीमित से मध्यम झटका लग सकता है परन्तु मजदुर प्रधान क्षेत्रों में परेशानी कुछ ज्यादा ही होगी l वर्तमान में टैरिफ से कुछ छुट तत्काल राहत दे सकती है परन्तु दीर्घ काल के लिए बाज़ार विविधिकरण, मूल्य संवर्धन, क़ानूनी और कुटनीतिक प्रयास से ही सफलता पाई जा सकती है l सरकार को भी क्रियान्वयन को दक्षता प्रदान करनी होगी ताकि देश में एक अनुकूल व्यापारिक माहौल तैयार किया जा सके l
