69 साल बाद खुला 2700 साल पुराना रहस्य! BHU में संदूक से निकाला गया प्राचीन कंकाल, अब DNA बताएगा काशी का इतिहास
वाराणसी: काशी के प्राचीन इतिहास से जुड़ा एक अहम अध्याय अब वैज्ञानिक जांच के जरिए खुलने जा रहा है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में पिछले 69 वर्षों से एक विशेष संदूक में सुरक्षित रखे गए लगभग 2700 वर्ष पुराने मानव कंकाल को मंगलवार को पहली बार बाहर निकाला गया। आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से इसकी जांच कर गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की आनुवंशिक पहचान, जीवनशैली और उत्पत्ति का पता लगाने की तैयारी शुरू हो गई है।
विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक प्रोटोकॉल के तहत लिए DNA सैंपल
बीएचयू के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के नेतृत्व में सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (CDFD), हैदराबाद के प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह और उनकी टीम ने अत्यंत सावधानी के साथ संदूक खोला। वैज्ञानिक मानकों का पालन करते हुए कंकाल से जांच के लिए नमूने एकत्र किए गए।
इस दौरान प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी. अहिरवार, प्रो. सुजाता गौतम, डॉ. सचिन तिवारी और डॉ. जोस टाम राफेल भी मौजूद रहे।
1957 के राजघाट उत्खनन में मिला था यह कंकाल
यह कंकाल वर्ष 1957 में बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के तत्कालीन विद्वानों प्रो. ए.के. नारायण और टी.एन. राय के नेतृत्व में राजघाट में हुए पहले पुरातात्विक उत्खनन के दौरान मिला था।
कंकाल के साथ उस समय मिट्टी के बर्तन, मोहरें और अन्य पुरावशेष भी मिले थे, जिन्हें भी लगभग 2700 वर्ष पुराना माना गया। करीब छह फीट लंबे इस कंकाल को विशेष संदूक में सुरक्षित रखकर विभाग के संरक्षण में रखा गया था।
रेडियोकार्बन डेटिंग और DNA टेस्ट से खुलेंगे कई रहस्य
प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि इस कंकाल की रेडियोकार्बन डेटिंग के जरिए इसकी वास्तविक आयु निर्धारित की जाएगी। वहीं डीएनए विश्लेषण से यह समझने में मदद मिलेगी कि उस समय काशी और गंगा घाटी में रहने वाले लोगों की आनुवंशिक संरचना कैसी थी और उनका मूल निवास कहां था। इसके अलावा ऑक्सीजन और कार्बन आइसोटोप विश्लेषण से उस दौर के लोगों के खान-पान, जीवनशैली और भौगोलिक परिस्थितियों की भी जानकारी मिलेगी।
गंगा घाटी की सभ्यता पर मिलेगा नया दृष्टिकोण
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह अध्ययन यह समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा कि गंगा घाटी की सभ्यता का विकास हड़प्पा, राखीगढ़ी और अन्य प्राचीन सभ्यताओं की तुलना में किस प्रकार अलग था। यह शोध भारतीय पुरातत्व और आधुनिक आनुवंशिक विज्ञान के समन्वय का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
पहले लखनऊ, फिर हैदराबाद में होगी जांच
सीडीएफडी के वैज्ञानिक डॉ. प्रज्ज्वल प्रताप सिंह ने बताया कि एकत्र किए गए नमूनों को पहले बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान, लखनऊ भेजा जाएगा। इसके बाद विस्तृत डीएनए विश्लेषण हैदराबाद स्थित प्रयोगशाला में किया जाएगा। उन्होंने बताया कि पूरी वैज्ञानिक रिपोर्ट आने में तीन से चार महीने का समय लग सकता है।
1940 में हुई थी राजघाट की ऐतिहासिक पहचान
राजघाट की ऐतिहासिक महत्ता का पता वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार कार्य के दौरान चला था। इसके बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और बीएचयू ने यहां व्यापक उत्खनन कराया।
1957 से 1969 के बीच हुए उत्खनन में आवासीय संरचनाएं, टेराकोटा कलाकृतियां, मोहरें और कई महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले थे। यही कंकाल भी उसी अभियान की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में शामिल था।
गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की पहचान से उठेगा पर्दा
विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी. अहिरवार ने कहा कि राजघाट काशी की प्राचीनता और सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण साक्ष्य है। दशकों से सुरक्षित रखे गए इस कंकाल का आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की सामाजिक पृष्ठभूमि, आनुवंशिक पहचान और जीवनशैली से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब दे सकता है।
