Movie prime

काशी की मिट्टी से ओलंपिक के मंच तक, इन खिलाड़ियों ने दुनिया में रोशन किया बनारस का नाम
 

 
 काशी की मिट्टी से ओलंपिक के मंच तक, इन खिलाड़ियों ने दुनिया में रोशन किया बनारस का नाम
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

वाराणसी। काशी की पहचान सिर्फ मंदिरों, घाटों, गंगा और अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से नहीं है। यह शहर खेल प्रतिभाओं की ऐसी धरती भी रहा है, जहां अखाड़ों की मिट्टी से लेकर हॉकी के मैदान, तैराकी के पूल, दौड़ की पटरियों और एथलेटिक्स के मैदान तक खिलाड़ियों ने अपने सपनों को आकार दिया है।

सीमित संसाधनों, कठिन परिस्थितियों और वर्षों की कड़ी मेहनत के बावजूद वाराणसी के कई खिलाड़ियों ने देश की जर्सी पहनकर ओलंपिक जैसे दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच तक अपनी जगह बनाई। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियां केवल पदक जीतने तक सीमित नहीं हैं। किसी ने पारंपरिक अखाड़े से अंतरराष्ट्रीय कुश्ती तक का सफर तय किया, तो किसी ने पानी में भारत का प्रतिनिधित्व किया। किसी ने हॉकी स्टिक से इतिहास रचा, तो किसी ने तीरंदाजी, लंबी कूद और भाला फेंक जैसी स्पर्धाओं में काशी का नाम दुनिया तक पहुंचाया।

मोहम्मद शाहिद के हॉकी के स्वर्णिम दौर से लेकर ललित उपाध्याय के लगातार दो ओलंपिक पदकों तक, इन खिलाड़ियों की यात्राएं संघर्ष, अनुशासन, त्याग और जुनून की कहानी कहती हैं। आइए जानते हैं काशी के उन 12 खिलाड़ियों की कहानी, जिन्होंने ओलंपिक के मंच पर भारत और बनारस का प्रतिनिधित्व किया।

1. अनंत राम भार्गव: जब काशी ने पहली बार ओलंपिक में दर्ज कराई मौजूदगी

काशी के शुरुआती ओलंपिक इतिहास में अनंत राम भार्गव का नाम बेहद महत्वपूर्ण है। वाराणसी के गायघाट मोहल्ले में जन्मे भार्गव ने 1948 के लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

यह वह दौर था जब देश को आजाद हुए ज्यादा समय नहीं हुआ था और खेलों के लिए आधुनिक सुविधाएं लगभग न के बराबर थीं। भारतीय पहलवानों की तैयारी मुख्य रूप से पारंपरिक अखाड़ों में होती थी। मिट्टी की कुश्ती, कठिन शारीरिक अभ्यास और गुरु से सीखे पारंपरिक दांव-पेच ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थे।

ऐसे माहौल में काशी से निकलकर ओलंपिक के अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। अनंत राम भार्गव ने काशी के खिलाड़ियों के लिए वह रास्ता खोला, जिस पर आगे चलकर कई अन्य खिलाड़ी चले।

2. सचिन नाग: लहरों पर भारत का नाम

वाराणसी में जन्मे सचिन नाग भारत के शुरुआती तैराकों और वाटरपोलो खिलाड़ियों में शामिल रहे। उनका ओलंपिक सफर 1948 के लंदन ओलंपिक से शुरू हुआ।

उन्होंने 100 मीटर तैराकी में भारत का प्रतिनिधित्व किया और 34वां स्थान हासिल किया। इसी ओलंपिक में वे भारतीय वाटरपोलो टीम का हिस्सा भी रहे। इसके बाद 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी उन्होंने वाटरपोलो में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

इससे पहले 1951 के दिल्ली एशियाई खेलों में सचिन नाग ने शानदार प्रदर्शन किया था। उन्होंने 100 मीटर तैराकी में स्वर्ण पदक जीता, जबकि दो अन्य स्पर्धाओं में कांस्य पदक हासिल किए।

उनकी उपलब्धियां यह साबित करती हैं कि काशी की खेल प्रतिभा केवल कुश्ती और हॉकी तक सीमित नहीं थी। पानी के खेलों में भी बनारस ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी दिया।

3. गुलजारा सिंह: काशी की रफ्तार पहुंची हेलसिंकी

वाराणसी के चितईपुर से जुड़े गुलजारा सिंह ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वे काशी के उन शुरुआती खिलाड़ियों में रहे जिन्होंने एथलेटिक्स के क्षेत्र में देश की जर्सी पहनी।

उस समय आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाओं का अभाव था। खिलाड़ियों को सीमित संसाधनों में ही अभ्यास करना पड़ता था। लंबी दूरी की दौड़ जैसी स्पर्धाओं में शारीरिक क्षमता के साथ निरंतर अभ्यास और अनुशासन की जरूरत होती है।

गुलजारा सिंह का हेलसिंकी तक पहुंचना काशी की खेल प्रतिभा के लिए एक नई दिशा थी। उस दौर में जहां कुश्ती और हॉकी भारतीय खेलों की प्रमुख पहचान माने जाते थे, वहीं उन्होंने दौड़ के मैदान में बनारस का नाम पहुंचाया।

4. लक्ष्मीकांत पांडेय: अखाड़े की मिट्टी से मेलबर्न तक

लक्ष्मीकांत पांडेय, जिन्हें चिक्कन पांडेय के नाम से भी जाना जाता है, काशी की पारंपरिक कुश्ती परंपरा से जुड़े प्रमुख खिलाड़ियों में रहे। कोइरीपुर खुर्द में जन्मे पांडेय ने 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

उनके दौर में कुश्ती की तैयारी आधुनिक जिम या वैज्ञानिक प्रशिक्षण पर नहीं, बल्कि अखाड़े की मिट्टी, कठिन व्यायाम और पारंपरिक दांव-पेच पर निर्भर थी।

मेलबर्न तक पहुंचकर उन्होंने यह साबित किया कि काशी के पारंपरिक अखाड़ों में तैयार होने वाला पहलवान भी अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंच सकता है।

उनका सफर पदक की कहानी से ज्यादा उस दौर की कहानी है, जब सीमित संसाधनों के बावजूद भारतीय खिलाड़ी विश्वस्तरीय प्रतियोगिताओं में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

5. मोहम्मद शाहिद: हॉकी की कलाकारी का काशी सितारा

काशी के सबसे चर्चित ओलंपिक खिलाड़ियों में मोहम्मद शाहिद का नाम सबसे आगे आता है। वाराणसी में जन्मे शाहिद भारतीय हॉकी में अपनी तेज रफ्तार, शानदार ड्रिब्लिंग और गेंद पर बेहतरीन नियंत्रण के लिए मशहूर हुए।

उन्होंने 1980, 1984 और 1988 के ओलंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1980 के मॉस्को ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता और शाहिद उस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा थे।

इसके अलावा उन्होंने एशियाई खेलों में भी भारत को पदक दिलाए। 1982 में रजत और 1986 में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय टीम का वे हिस्सा रहे।

हॉकी में उनके योगदान के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

शाहिद की खासियत उनकी तेज गति और गेंद पर अद्भुत नियंत्रण थी। वे विपक्षी खिलाड़ियों के बीच से गेंद निकालकर अचानक आक्रमण करने के लिए जाने जाते थे। 2016 में उनके निधन के बाद भी भारतीय हॉकी में उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाता है।

काशी के खेल इतिहास में मोहम्मद शाहिद आज भी हॉकी के सबसे चमकदार सितारों में गिने जाते हैं।

6. विवेक सिंह: कठिन दौर में थामी हॉकी की कमान

वाराणसी में जन्मे विवेक सिंह ने 1988 के सियोल ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया। वे भारतीय रेलवे से भी जुड़े रहे।

उनका ओलंपिक सफर ऐसे समय में आया जब भारतीय हॉकी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। यूरोप और अन्य देशों की टीमें तेजी से मजबूत हो रही थीं और भारत का पारंपरिक दबदबा कमजोर पड़ने लगा था।

सियोल ओलंपिक में भारतीय टीम छठे स्थान पर रही। इसके बाद भी विवेक सिंह ने अंतरराष्ट्रीय हॉकी में अपना सफर जारी रखा। 1990 के बीजिंग एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने वाली भारतीय टीम में भी वे शामिल रहे।

2007 में वाराणसी में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी उम्र महज 39 वर्ष थी।

उनकी कहानी यह बताती है कि खिलाड़ी की महानता सिर्फ पदकों से तय नहीं होती। देश की जर्सी पहनकर ओलंपिक के मैदान तक पहुंचना भी अपने आप में गौरव की बात है।

7. संजीव सिंह: काशी का निशाना पहुंचा ओलंपिक तक

वाराणसी के दारानगर से जुड़े संजीव सिंह ने 1988 के सियोल ओलंपिक में तीरंदाजी में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

उस समय भारत में तीरंदाजी आज की तरह लोकप्रिय नहीं थी और खिलाड़ियों के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं और अनुभव भी सीमित थे।

सियोल में संजीव सिंह ने व्यक्तिगत तीरंदाजी स्पर्धा में 36वां स्थान हासिल किया। भारतीय टीम ने टीम स्पर्धा में 20वां स्थान प्राप्त किया।

आज भारत के तीरंदाज अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीत रहे हैं। इस सफलता की शुरुआती कड़ियों में उन खिलाड़ियों का योगदान भी रहा जिन्होंने उस दौर में विश्व मंच पर भारत की मौजूदगी दर्ज कराई।

संजीव सिंह का सफर बताता है कि काशी की खेल प्रतिभा केवल कुश्ती और हॉकी तक सीमित नहीं रही।

8. राहुल सिंह: अटलांटा तक पहुंची काशी की हॉकी

वाराणसी में जन्मे राहुल सिंह ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया।

वे उस पीढ़ी का हिस्सा थे जिसने बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल में भारतीय हॉकी को संभालने की कोशिश की। 1990 के दशक में यूरोप और ऑस्ट्रेलिया की टीमें मजबूत हो चुकी थीं और भारतीय हॉकी को लगातार कड़ी चुनौती मिल रही थी।

ऐसे समय में राष्ट्रीय टीम में जगह बनाना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।

राहुल सिंह से पहले मोहम्मद शाहिद जैसे खिलाड़ियों ने काशी की हॉकी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई थी। राहुल सिंह ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अटलांटा में भारत की जर्सी पहनी।

उनकी कहानी काशी की हॉकी परंपरा की निरंतरता को दर्शाती है।

9. संजय राय: सुसवाही से सिडनी तक लंबी छलांग

वाराणसी के सुसवाही क्षेत्र से जुड़े संजय राय ने 2000 के सिडनी ओलंपिक में लंबी कूद में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

लंबी कूद सिर्फ ताकत का खेल नहीं है। इसमें दौड़ की गति, टेकऑफ का सही समय, शरीर का संतुलन और लैंडिंग की तकनीक का बेहतरीन तालमेल जरूरी होता है।

उस समय भारत में एथलेटिक्स खिलाड़ियों के लिए आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं आज की तुलना में काफी सीमित थीं। इसके बावजूद संजय राय ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई और ओलंपिक तक पहुंचे।

उनका सफर यह साबित करता है कि काशी की खेल प्रतिभा व्यक्तिगत स्पर्धाओं में भी अपनी पहचान बना सकती है।

10. शिवपाल सिंह: भाले की उड़ान टोक्यो तक

रामनगर से जुड़े शिवपाल सिंह ने भाला फेंक में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और टोक्यो ओलंपिक में भारतीय दल का हिस्सा बने।

भाला फेंक में खिलाड़ी को अपनी दौड़ की गति, शारीरिक ताकत और तकनीक को एक सही क्षण पर भाले में बदलना होता है। छोटी सी तकनीकी गलती भी प्रदर्शन पर बड़ा असर डाल सकती है।

शिवपाल ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार प्रदर्शन करते हुए भारतीय टीम में अपनी जगह बनाई।

उनका ओलंपिक सफर इस बात का प्रतीक है कि काशी की नई पीढ़ी पारंपरिक खेलों से आगे बढ़कर आधुनिक एथलेटिक्स में भी अपनी पहचान बना रही है।

11. ललित उपाध्याय: काशी के नाम लगातार दो ओलंपिक कांस्य

वाराणसी के भगतपुर से जुड़े ललित उपाध्याय ने काशी की हॉकी परंपरा को आधुनिक दौर में नई ऊंचाई दी।

वे भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ टोक्यो 2020 और पेरिस 2024 ओलंपिक में खेले। दोनों ही खेल आयोजनों में भारतीय टीम ने कांस्य पदक जीता।

इस तरह ललित लगातार दो ओलंपिक में पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य बने।

ललित की पहचान तेज खेल, आक्रमण में सक्रियता और टीम के लिए लगातार मेहनत करने वाले खिलाड़ी के रूप में बनी। राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने से पहले उन्होंने जूनियर स्तर और घरेलू प्रतियोगिताओं में लंबा सफर तय किया।

टोक्यो में भारतीय हॉकी ने लंबे इंतजार के बाद ओलंपिक पदक हासिल किया और पेरिस में टीम ने एक बार फिर कांस्य पदक जीतकर इस सफलता को दोहराया।

ललित की उपलब्धि काशी के लिए इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने मोहम्मद शाहिद की पीढ़ी से कई दशक बाद बनारस की हॉकी परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर फिर मजबूती से स्थापित किया।

काशी की खेल परंपरा, जो लगातार आगे बढ़ रही है

इन खिलाड़ियों की यात्राएं अलग-अलग हैं, लेकिन इनकी कहानियों में एक बात समान है—संघर्ष और लगातार मेहनत।

किसी ने अखाड़े की मिट्टी से शुरुआत की, किसी ने पानी में अपनी पहचान बनाई, किसी ने हॉकी के मैदान पर भारत का झंडा ऊंचा किया और किसी ने दौड़, तीरंदाजी, लंबी कूद और भाला फेंक जैसी स्पर्धाओं में देश का प्रतिनिधित्व किया।