काशी की अनोखी परंपरा: 108 थाल, वैदिक मंत्र और मंगलगीतों के बीच हुई माता गौरा की हल्दी
वाराणसी में शिव-गौरा विवाह परंपरा के तहत टेढ़ीनीम में माता गौरा के गौने की हल्दी रस्म वैदिक मंत्रों और 108 थाल भोग के साथ संपन्न हुई। बनारसी श्रृंगार में माता के दर्शन को भारी भीड़ उमड़ी। अब 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी पर बाबा की पालकी यात्रा से परंपरा का समापन होगा।
वाराणसी: धर्म की नगरी काशी में मंगलवार को शिव-गौरा विवाह परंपरा के अंतर्गत माता गौरा के गौने की हल्दी रस्म पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ निभाई गई। टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास में आयोजित इस परंपरा में 108 थालों में भोग सजाया गया और नौ गौरी व नौ दुर्गा के आह्वान मंत्रों से अभिमंत्रित पावन हल्दी माता गौरा की चल प्रतिमा पर अर्पित की गई। इस दौरान पूरा परिसर हर-हर महादेव और जय गौरा के उद्घोष से गूंज उठा।
माता के दिव्य और भव्य श्रृंगारित स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की लंबी कतार देर रात तक लगी रही। अब 27 फरवरी को रंगभरी एकादशी पर बाबा की पालकी यात्रा के साथ इस लोकपरंपरा का समापन होगा।
दुर्गाकुंड मंदिर में हुआ विशेष वैदिक अनुष्ठान
हल्दी रस्म की शुरुआत सुबह दुर्गा मंदिर में विशेष पूजन से हुई। मंदिर के महंत कौशल द्विवेदी के आचार्यत्व में वैदिक ब्राह्मणों ने नौ गौरी और नौ दुर्गा के आह्वान मंत्रों के साथ हल्दी का पूजन किया। शंखध्वनि, घंटानाद और वैदिक ऋचाओं के बीच हल्दी को अभिमंत्रित कर मंगलमय बनाया गया, जिसे बाद में शोभायात्रा के माध्यम से टेढ़ीनीम लाया गया।
शाम को महंत परिवार और श्रद्धालुओं ने भव्य शोभायात्रा निकाली। मार्ग में भक्तों ने पुष्पवर्षा कर यात्रा का स्वागत किया। पूर्व महंत स्वर्गीय कुलपति तिवारी के पुत्र और आयोजक पं. वाचस्पति तिवारी के सानिध्य में 11 वैदिक ब्राह्मणों ने माता गौरा का पूजन कराया।
वैदिक मंत्रों के बीच माता को मंडप में विराजमान कराया गया और अभिमंत्रित हल्दी अर्पित की गई। इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक मंगलगीत और सोहर गाकर माहौल को भक्तिमय बना दिया।
बनारसी वस्त्र और आभूषणों से हुआ माता का दिव्य श्रृंगार
हल्दी रस्म के बाद माता गौरा का भव्य श्रृंगार किया गया। उन्हें बनारसी वस्त्र, रत्नाभूषण, पुष्पमालाएं और सिंदूरी आभा से सजाया गया। माता के इस अलौकिक स्वरूप के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी और पूरा वातावरण भक्तिरस में डूब गया।
काशी की यह परंपरा भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह और गौना की लोकमान्यता से जुड़ी है, जिसे हर वर्ष रंगभरी एकादशी तक विशेष अनुष्ठानों के साथ निभाया जाता है।
