काशी की महान विभूतियों को सम्मान: भारत रत्न बिस्मिल्लाह खां का घर बनेगा म्यूजियम, 30 करोड़ से संवरेगी विरासत
Jun 4, 2026, 13:27 IST
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वाराणसी नगर निगम ने काशी की महान विभूतियों की स्मृतियों को संरक्षित करने और उनके योगदान को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है। इसके तहत नगर निगम ने 30 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित किया है, जिससे भारत रत्न, पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित हस्तियों के घरों और आसपास के क्षेत्रों का सुंदरीकरण कराया जाएगा।
इसी योजना के तहत भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के बेनिया स्थित हड़हा सराय वाले पैतृक मकान को नया स्वरूप दिया जाएगा। नगर निगम यहां संग्रहालय विकसित करने के साथ-साथ घर तक जाने वाली गलियों का भी सौंदर्यीकरण करेगा।
30 करोड़ की योजना से संवरेगी काशी की सांस्कृतिक विरासत
नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के अनुसार काशी देश की उन चुनिंदा नगरीयों में शामिल है, जहां अनेक भारत रत्न और पद्म सम्मान प्राप्त विभूतियों ने जीवन व्यतीत किया है। ऐसे में नगर निगम ने निर्णय लिया है कि इन महान व्यक्तित्वों के निवास स्थानों और उनसे जुड़े क्षेत्रों को विकसित कर उन्हें सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।
योजना के तहत सड़क, फुटपाथ, प्रकाश व्यवस्था और भवनों के बाहरी हिस्सों को आकर्षक बनाया जाएगा। साथ ही उन गलियों का भी नवीनीकरण होगा जो इन विभूतियों के घरों तक पहुंचती हैं।
बिस्मिल्लाह खां के घर का तैयार हुआ डीपीआर
नगर निगम ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के मकान के सुंदरीकरण की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर शासन को भेज दी है। टेंडर प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है और जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है।
परियोजना में मकान के मुख्य भवन के संरक्षण के साथ-साथ आसपास की गलियों का चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण भी शामिल है, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आसानी से वहां पहुंच सकें।
उस्ताद की यादों को संजोएगा संग्रहालय
बिस्मिल्लाह खां के मकान की ऊपरी मंजिल पर स्थित उनके निजी कमरे को संग्रहालय में बदला जाएगा। इस संग्रहालय में उनकी शहनाई, टोपी, छाता, लालटेन, हाथ का पंखा, चप्पल, कलम, बक्सा और उनसे जुड़ी अन्य स्मृतियों को संरक्षित किया जाएगा।
संग्रहालय का उद्देश्य केवल उनकी वस्तुओं को प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि उनकी कला, साधना और जीवन दर्शन को भी लोगों तक पहुंचाना होगा।
गलियों में दिखेगी शहनाई सम्राट की विरासत
नगर निगम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के घर तक जाने वाले मार्ग को भी विशेष थीम पर विकसित करेगा। रास्ते में उनके जीवन, संगीत साधना और देश के लिए दिए गए योगदान को दर्शाते भित्ति चित्र (म्यूरल) लगाए जाएंगे। साथ ही आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और आकर्षक सड़क निर्माण से पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक पहचान दी जाएगी।
शहनाई को विश्व मंच तक पहुंचाने वाले कलाकार
15 फरवरी 1935 को बिहार के डुमरांव में जन्मे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां बचपन में ही वाराणसी आ गए थे। उनके मामा अली बख्श काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई वादन करते थे, जिनसे उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।
1937 में उन्होंने पहली बार ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में शहनाई प्रस्तुत की और इसके बाद उनकी पहचान देश-दुनिया में बनने लगी। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी की पूर्व संध्या पर लाल किले की प्राचीर से उनकी शहनाई की गूंज ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल थे बिस्मिल्लाह खां
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां केवल एक महान संगीतकार ही नहीं, बल्कि काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति के जीवंत प्रतीक भी थे। वे अक्सर बालाजी घाट पर घंटों शहनाई का रियाज किया करते थे। उन्होंने अमेरिका, कनाडा, ईरान, इराक, अफगानिस्तान और कई अन्य देशों में भारतीय संगीत का परचम लहराया।
कहा जाता है कि उन्हें अमेरिका में बसने का प्रस्ताव भी मिला था, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया था कि "अमेरिका में आप मेरी गंगा कहां से लाओगे?"
सैन्य सम्मान के साथ हुआ था अंतिम संस्कार
21 अगस्त 2006 को लंबी बीमारी के बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का निधन हो गया। वाराणसी में उन्हें पूरे राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए और पूरे रास्ते पुष्प वर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दी गई।
अब उनका घर संग्रहालय के रूप में विकसित होने जा रहा है, जिससे आने वाली पीढ़ियां शहनाई के इस महान जादूगर की विरासत को करीब से जान सकेंगी।
इसी योजना के तहत भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के बेनिया स्थित हड़हा सराय वाले पैतृक मकान को नया स्वरूप दिया जाएगा। नगर निगम यहां संग्रहालय विकसित करने के साथ-साथ घर तक जाने वाली गलियों का भी सौंदर्यीकरण करेगा।
30 करोड़ की योजना से संवरेगी काशी की सांस्कृतिक विरासत
नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के अनुसार काशी देश की उन चुनिंदा नगरीयों में शामिल है, जहां अनेक भारत रत्न और पद्म सम्मान प्राप्त विभूतियों ने जीवन व्यतीत किया है। ऐसे में नगर निगम ने निर्णय लिया है कि इन महान व्यक्तित्वों के निवास स्थानों और उनसे जुड़े क्षेत्रों को विकसित कर उन्हें सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संरक्षित किया जाए।
योजना के तहत सड़क, फुटपाथ, प्रकाश व्यवस्था और भवनों के बाहरी हिस्सों को आकर्षक बनाया जाएगा। साथ ही उन गलियों का भी नवीनीकरण होगा जो इन विभूतियों के घरों तक पहुंचती हैं।
बिस्मिल्लाह खां के घर का तैयार हुआ डीपीआर
नगर निगम ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के मकान के सुंदरीकरण की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) तैयार कर शासन को भेज दी है। टेंडर प्रक्रिया भी पूरी हो चुकी है और जल्द ही निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है।
परियोजना में मकान के मुख्य भवन के संरक्षण के साथ-साथ आसपास की गलियों का चौड़ीकरण और सौंदर्यीकरण भी शामिल है, ताकि देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आसानी से वहां पहुंच सकें।
उस्ताद की यादों को संजोएगा संग्रहालय
बिस्मिल्लाह खां के मकान की ऊपरी मंजिल पर स्थित उनके निजी कमरे को संग्रहालय में बदला जाएगा। इस संग्रहालय में उनकी शहनाई, टोपी, छाता, लालटेन, हाथ का पंखा, चप्पल, कलम, बक्सा और उनसे जुड़ी अन्य स्मृतियों को संरक्षित किया जाएगा।
संग्रहालय का उद्देश्य केवल उनकी वस्तुओं को प्रदर्शित करना नहीं, बल्कि उनकी कला, साधना और जीवन दर्शन को भी लोगों तक पहुंचाना होगा।
गलियों में दिखेगी शहनाई सम्राट की विरासत
नगर निगम उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के घर तक जाने वाले मार्ग को भी विशेष थीम पर विकसित करेगा। रास्ते में उनके जीवन, संगीत साधना और देश के लिए दिए गए योगदान को दर्शाते भित्ति चित्र (म्यूरल) लगाए जाएंगे। साथ ही आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और आकर्षक सड़क निर्माण से पूरे क्षेत्र को सांस्कृतिक पहचान दी जाएगी।
शहनाई को विश्व मंच तक पहुंचाने वाले कलाकार
15 फरवरी 1935 को बिहार के डुमरांव में जन्मे उस्ताद बिस्मिल्लाह खां बचपन में ही वाराणसी आ गए थे। उनके मामा अली बख्श काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई वादन करते थे, जिनसे उन्होंने संगीत की प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की।
1937 में उन्होंने पहली बार ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस में शहनाई प्रस्तुत की और इसके बाद उनकी पहचान देश-दुनिया में बनने लगी। 15 अगस्त 1947 को भारत की आजादी की पूर्व संध्या पर लाल किले की प्राचीर से उनकी शहनाई की गूंज ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी।
गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल थे बिस्मिल्लाह खां
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां केवल एक महान संगीतकार ही नहीं, बल्कि काशी की गंगा-जमुनी संस्कृति के जीवंत प्रतीक भी थे। वे अक्सर बालाजी घाट पर घंटों शहनाई का रियाज किया करते थे। उन्होंने अमेरिका, कनाडा, ईरान, इराक, अफगानिस्तान और कई अन्य देशों में भारतीय संगीत का परचम लहराया।
कहा जाता है कि उन्हें अमेरिका में बसने का प्रस्ताव भी मिला था, लेकिन उन्होंने यह कहते हुए मना कर दिया था कि "अमेरिका में आप मेरी गंगा कहां से लाओगे?"
सैन्य सम्मान के साथ हुआ था अंतिम संस्कार
21 अगस्त 2006 को लंबी बीमारी के बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का निधन हो गया। वाराणसी में उन्हें पूरे राजकीय और सैन्य सम्मान के साथ सुपुर्द-ए-खाक किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए और पूरे रास्ते पुष्प वर्षा कर उन्हें अंतिम विदाई दी गई।
अब उनका घर संग्रहालय के रूप में विकसित होने जा रहा है, जिससे आने वाली पीढ़ियां शहनाई के इस महान जादूगर की विरासत को करीब से जान सकेंगी।
