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डिजिटल मीडिया के प्रभाव और चुनौतियों पर मंथन: बनारस ग्लोबल टाइम्स की विचार गोष्ठी में विशेषज्ञों ने किया जागरूक

 
डिजिटल मीडिया
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वाराणसी: डिजिटल मीडिया के तेजी से बढ़ते प्रभाव, समाज पर उसके सकारात्मक और नकारात्मक असर तथा भविष्य की चुनौतियों को लेकर रविवार को बनारस ग्लोबल टाइम्स की ओर से महमूरगंज स्थित होटल लैंडमार्क में एक विशेष 'सायंकालीन विचार गोष्ठी' आयोजित की गई। 'डिजिटल मीडिया का भविष्य एवं समाज पर इसका प्रभाव-भारत की भूमिका एवं चुनौतियां' विषय पर आयोजित इस कार्यक्रम में शिक्षाविदों, पत्रकारों, समाजसेवियों, प्रशासनिक अधिकारियों और युवाओं ने भाग लेकर अपने विचार साझा किए।

कार्यक्रम का संचालन आर्थिकी विशेषज्ञ एम.के. पांडेय और करियर काउंसलर रविंद्र सहाय ने संयुक्त रूप से किया। दोनों ने डिजिटल मीडिया के बदलते स्वरूप, उसकी संभावनाओं और समाज पर पड़ रहे प्रभावों को रेखांकित करते हुए सार्थक संवाद की भूमिका रखी।

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दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और अतिथियों के स्वागत के साथ हुआ। आयोजन समिति की ओर से आर.के. नेत्रालय के संस्थापक डॉ. आर.के. ओझा ने मुख्य वक्ता रत्नाकर त्रिपाठी, काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरुण मिश्रा तथा पूर्व जॉइंट सीपी संतोष सिंह को अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया।

जीवनभर सीखते रहना ही विकास का आधार : डॉ. आर.के. ओझा

अपने संबोधन में आर.के. नेत्रालय के संस्थापक डॉ. आर.के. ओझा ने कहा कि विचार गोष्ठी का उद्देश्य केवल चर्चा करना नहीं, बल्कि समाज को जागरूक बनाना है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को जीवनभर सीखते रहना चाहिए और जनसेवा कभी नहीं रुकनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि देश को मजबूत बनाना है तो सबसे पहले नागरिकों को जागरूक और जिम्मेदार बनाना होगा। आने वाली पीढ़ियां हमें हमारे कार्यों से याद रखें, ऐसा प्रयास प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए।

डॉ. ओझा ने कहा कि 140 करोड़ की आबादी वाले देश में डिजिटल मीडिया करोड़ों लोगों तक पहुंचने का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुका है। ऐसे में सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की जवाबदेही तय होनी चाहिए और युवाओं तक पहुंचने वाली सूचनाओं की विश्वसनीयता पर भी गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है।

फेक न्यूज, डीपफेक और डेटा प्राइवेसी सबसे बड़ी चुनौती : रत्नाकर त्रिपाठी

मुख्य वक्ता रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा कि आज लगभग हर व्यक्ति सोशल मीडिया के जरिए सूचनाएं प्राप्त कर रहा है, लेकिन अधिकांश लोग उनकी सत्यता की जांच नहीं करते।

उन्होंने कहा कि फेक न्यूज, AI आधारित डीपफेक, डेटा प्राइवेसी का खतरा और सोशल मीडिया की लत आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों के रूप में उभर चुकी हैं।

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डेटा प्राइवेसी पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा कि स्मार्टफोन, सर्च इंजन और डिजिटल प्लेटफॉर्म लगातार लोगों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उनके व्यवहार से जुड़ा डेटा एकत्र कर रहे हैं।

'डूम स्क्रॉलिंग' युवाओं को धकेल रही अवसाद की ओर

रत्नाकर त्रिपाठी ने कहा कि सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म उपयोगकर्ताओं को लगातार उसी तरह का कंटेंट दिखाता है, जिसे वे पहले देख चुके होते हैं। इससे नकारात्मक खबरों और वीडियो की अधिकता मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल रही है। उन्होंने बताया कि औसतन एक भारतीय प्रतिदिन करीब 3 घंटे 20 मिनट स्क्रीन पर बिताता है, जो डिजिटल एडिक्शन की गंभीरता को दर्शाता है।

'इको चैंबर' सीमित कर रहा हमारी सोच

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया का इको चैंबर लोगों की सोच को सीमित कर रहा है। एल्गोरिद्म व्यक्ति को केवल वही सामग्री दिखाता है, जो उसकी पहले से बनी हुई राय के अनुरूप होती है। इससे नई सोच और वैकल्पिक दृष्टिकोण तक पहुंच कम होती जा रही है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज अवसर भी है और चुनौती भी। इसका जिम्मेदारी से उपयोग करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

सत्यापित खबर ही मीडिया की सबसे बड़ी ताकत: अरुण मिश्रा

काशी पत्रकार संघ के अध्यक्ष अरुण मिश्रा ने कहा कि डिजिटल मीडिया सूचना पहुंचाने का सबसे तेज माध्यम बन चुका है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी चुनौती विश्वसनीयता है।

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उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ समय पहले अभिनेता धर्मेंद्र के निधन की झूठी खबर सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई थी, जो बाद में पूरी तरह गलत साबित हुई। ऐसे मामलों से मीडिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि किसी भी समाचार को प्रकाशित या प्रसारित करने से पहले उसका तथ्यात्मक सत्यापन करना मीडिया संस्थानों की नैतिक जिम्मेदारी है।

तकनीक के साथ संवेदनाएं भी बचानी होंगी : संतोष सिंह

पूर्व जॉइंट सीपी संतोष सिंह ने कहा कि सूचना हर युग में लोगों तक पहुंचती रही है, लेकिन डिजिटल युग ने इसकी गति को कई गुना बढ़ा दिया है।

उन्होंने कहा कि तकनीक सुविधाएं तो बढ़ा रही है, लेकिन परिवारों में संवाद और संवेदनाएं कम होती जा रही हैं। बच्चों का बचपन प्रभावित हो रहा है और बड़े-बुजुर्गों के प्रति सम्मान भी घट रहा है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि डिजिटल माध्यम का सकारात्मक उपयोग करें और नकारात्मक कंटेंट से दूरी बनाएं।

जिम्मेदार डिजिटल समाज बनाने का लिया संकल्प

कार्यक्रम के अंत में सभी वक्ताओं ने डिजिटल साक्षरता, तथ्य आधारित पत्रकारिता, जिम्मेदार सोशल मीडिया व्यवहार और फेक न्यूज के खिलाफ सामूहिक जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक तभी सार्थक होगी जब उसका उपयोग समाज और राष्ट्रहित में जिम्मेदारी के साथ किया जाए। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने भी डिजिटल मीडिया से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार साझा किए और इस तरह के जनजागरूकता कार्यक्रमों को समय-समय पर आयोजित करने की आवश्यकता बताई।