Movie prime

इंद्र बरसो रे काशी नगरिया...इंद्रदेव को प्रसन्न करने के लिए काशी में अनूठा अनुष्ठान, शहनाई के सुरों से की गई बारिश की कामना

 
..
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

वाराणसी। ज्येष्ठ और आषाढ़ की भीषण गर्मी से तप रही काशी में बारिश की कामना को लेकर एक अनोखा सांस्कृतिक और धार्मिक आयोजन देखने को मिला। धर्मनगरी के ऐतिहासिक रीवा घाट पर संगीत के सुरों के माध्यम से इंद्रदेव को प्रसन्न करने का विशेष अनुष्ठान आयोजित किया गया, जिसमें शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध राग ‘मेघ’ का वादन कर वर्षा की प्रार्थना की गई।

 

..

सुबह के समय गंगा तट पर आयोजित इस कार्यक्रम में काशी के प्रख्यात शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनकी टीम ने भाग लिया। कार्यक्रम की शुरुआत मां गंगा के विधिवत पूजन-अर्चन से हुई। कलाकारों ने मां गंगा को पारंपरिक ‘पियरी’ अर्पित कर लोककल्याण और समय पर वर्षा की कामना की।

राग मेघ के सुरों से बादलों को दिया आमंत्रण

अनुष्ठान के दौरान पंडित महेंद्र प्रसन्ना ने शहनाई पर राग ‘मेघ’ की प्रस्तुति दी। भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग मेघ को वर्षा और बादलों से जुड़ा माना जाता है। शहनाई से निकले मधुर और गंभीर स्वरों ने घाट पर मौजूद श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सुरों के माध्यम से बादलों को काशी आने का निमंत्रण दिया जा रहा हो।

...

भजनों से भक्तिमय हुआ माहौल

राग मेघ की प्रस्तुति के बाद कलाकारों ने पारंपरिक भजनों और शास्त्रीय रचनाओं का गायन-वादन किया। "इंद्र बरसो रे काशी नगरिया..." जैसे लोकभावना से जुड़े गीतों ने पूरे वातावरण को भक्तिमय बना दिया। घाट पर मौजूद लोगों ने भी इस आयोजन में उत्साहपूर्वक भाग लिया और वर्षा की कामना की।

आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम

काशी की पहचान केवल धार्मिक नगरी के रूप में ही नहीं, बल्कि संगीत और संस्कृति की राजधानी के रूप में भी रही है। यहां संकट या प्राकृतिक चुनौतियों के समय कलाकार अपनी कला को जनकल्याण और ईश्वर आराधना का माध्यम बनाते रहे हैं। रीवा घाट पर आयोजित यह अनुष्ठान उसी परंपरा का जीवंत उदाहरण बना।

श्रद्धालुओं और कलाकारों को विश्वास है कि शहनाई के सुरों से की गई यह प्रार्थना इंद्रदेव तक पहुंचेगी और जल्द ही काशीवासियों को भीषण गर्मी से राहत मिलेगी।

कार्यक्रम में शामिल कलाकार

पंडित महेंद्र प्रसन्ना– मुख्य शहनाई वादन
गणेश प्रसाद – सहयोगी शहनाई वादक
केदारनाथ मिश्र – दुकड़ (पारंपरिक अवनद्ध वाद्य)
मालचंद स्वर– गायन सहयोग
प्रभात प्रसन्न – स्वर मंडल