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BHU में 2000 साल पुरानी सिक्का ढलाई तकनीक सिखाने की पहल, 7 दिन की खास कार्यशाला शुरू
 

 
 BHU में 2000 साल पुरानी सिक्का ढलाई तकनीक सिखाने की पहल, 7 दिन की खास कार्यशाला शुरू
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वाराणसी: Banaras Hindu University (BHU) में पहली बार भारतीय राजवंशों के मेटल साइंस और 2000 वर्ष पुरानी सिक्कों की टकसाल यानी ढलाई तकनीक सिखाने के लिए विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया है। यह सात दिवसीय हैंड्स-ऑन कार्यशाला 16 से 22 अप्रैल तक आयोजित की जा रही है, जिसमें कुल 60 सीटें निर्धारित की गई हैं।

इस कार्यशाला में यूजी, पीजी और पीएचडी के छात्र-छात्राओं को भाग लेने का अवसर दिया गया है। कार्यक्रम के दौरान छात्रों को प्राचीन सिक्कों से जुड़ी फोर्जरी (जालसाजी) को रोकने के आधुनिक तरीके भी सिखाए जाएंगे। जाली सिक्कों की पहचान के लिए पारंपरिक तकनीकों के साथ नई टेक्नोलॉजी की जानकारी भी दी जाएगी।

कार्यशाला में सिक्कों का इतिहास, भारत की मुद्रा प्रणाली, प्राचीन व्यापार नेटवर्क, मेटल साइंस का विकास, धार्मिक प्रतीक, मूर्तिकला परंपराएं और लिपियों के विकास जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा होगी। साथ ही पंचमार्क सिक्कों से लेकर क्षेत्रीय और शाही सिक्कों तक की यात्रा को भी समझाया जाएगा।

इस दौरान टकसाल की संरचना, निर्माण तकनीक, लिपियां, लेखन शैली, टाइपोलॉजी और आइकोनोग्राफी जैसे विषयों पर विशेषज्ञ जानकारी देंगे। कार्यक्रम में जियोलॉजिस्ट, मुद्राशास्त्री और पुराविद विशेषज्ञ के रूप में शामिल होंगे।

यह कार्यशाला प्रो. आरके नारायणन के 100वें जन्मदिवस के अवसर पर एआईएचसी और आर्कियोलॉजी विभाग द्वारा आयोजित की जा रही है। विभाग के अनुसार, मुद्राशास्त्र में व्यवस्थित शैक्षणिक प्रशिक्षण के अवसर बेहद सीमित हैं, खासकर यूजी और पीजी स्तर पर।

प्रो. अमित उपाध्याय के अनुसार, इस कार्यशाला में छात्रों को सिक्कों को हाथ में लेकर उनकी पहचान, वर्गीकरण और प्राचीन तकनीकों से निर्माण की प्रक्रिया का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा।