Movie prime

काशी विश्वनाथ मंदिर में क्यों ढीले हो रहे सोने के पत्तर? IIT मद्रास की टीम ने किया तकनीकी सर्वे

काशी विश्वनाथ मंदिर के पत्थरों के संरक्षण के लिए IIT मद्रास की टीम ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण पूरा कर लिया है। टीम नमूने जांच के लिए चेन्नई ले गई है। 20 दिनों में रिपोर्ट सौंपी जाएगी, जिसमें ढीले हो रहे स्वर्ण पत्तर और शिखर से गिरे स्वर्णमंडित कलश को सुरक्षित करने के उपाय बताए जाएंगे।

 
काशी विश्वनाथ मंदिर
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

वाराणसी: श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर के पत्थरों को क्षरण से बचाने और उनकी मजबूती बनाए रखने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मद्रास की तकनीकी टीम ने अपना विस्तृत सर्वेक्षण पूरा कर लिया है। डॉ. अरुण मेनन के नेतृत्व में आई विशेषज्ञों की टीम शुक्रवार को चेन्नई लौट गई। टीम मंदिर परिसर के पत्थरों और आसपास की मिट्टी के नमूने भी अपने साथ ले गई है। प्रयोगशाला में जांच और तकनीकी विश्लेषण के बाद 20 दिनों के भीतर मंदिर प्रशासन को रिपोर्ट सौंपी जाएगी।

लेजर और सेंसर से किया मंदिर का तकनीकी सर्वे

IIT मद्रास की टीम ने अत्याधुनिक लेजर और सेंसर युक्त मशीनों की मदद से मंदिर परिसर के महत्वपूर्ण हिस्सों का गहन तकनीकी परीक्षण किया। इसमें मुख्य गर्भगृह के अलावा दंडपाणि मंदिर और बैकुंठ मंदिर को भी शामिल किया गया।

सर्वेक्षण के दौरान विशेषज्ञों ने मंदिर की संरचना में इस्तेमाल पत्थरों की भार वहन क्षमता, उनमें मौजूद नमी के स्तर और जमीन की गहराई से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाए। इसके साथ ही पत्थरों और आसपास की मिट्टी के जरूरी नमूने लेकर जांच के लिए चेन्नई भेजे गए हैं।
पत्थरों की सफाई और स्वर्णमंडन की प्रक्रिया की भी ली जानकारी
तकनीकी सर्वे के दौरान विशेषज्ञों ने मंदिर प्रशासन से पत्थरों की नियमित सफाई, रखरखाव और पहले कराए गए स्वर्णमंडन की तकनीकी प्रक्रियाओं के बारे में भी जानकारी ली। अधिकारियों ने पत्थरों के संरक्षण और उनके क्षरण को रोकने के लिए अब तक किए गए प्रयासों की जानकारी टीम के साथ साझा की।

इस दौरान श्रीकाशी विद्वत परिषद के पदाधिकारी भी मौजूद रहे। मंडलायुक्त एस. राजलिंगम ने बताया कि IIT मद्रास की टीम 20 दिनों में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी।

स्वर्ण पत्तर और कलश को सुरक्षित करने की बनेगी कार्ययोजना

टीम की रिपोर्ट में मंदिर के पत्थरों के संरक्षण के साथ स्वर्ण पत्तर और स्वर्णमंडित कलश से जुड़ी समस्याओं के समाधान पर भी सुझाव दिए जाएंगे। पत्थरों के क्षरण के कारण मंदिर के अलग-अलग हिस्सों में स्वर्ण पत्तर ढीले हो रहे हैं। ऐसे में मंदिर के मूल स्वरूप से छेड़छाड़ किए बिना इनके स्थायी समाधान की कार्ययोजना तैयार की जाएगी।

इसके अलावा शिखर से गिरे स्वर्णमंडित कलश को दोबारा सुरक्षित तरीके से स्थापित करने के लिए भी तकनीकी सुझाव दिए जाएंगे।
1777 से 1780 के बीच हुआ था मंदिर का निर्माण

श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार और निर्माण वर्ष 1777 से 1780 के बीच इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने करवाया था। मंदिर के निर्माण में मुख्य रूप से विंध्य पर्वतमाला के मीरजापुर-चुनार क्षेत्र के गुलाबी बलुआ पत्थर का इस्तेमाल किया गया है।

यह पत्थर नक्काशी के लिए अनुकूल होने के साथ मजबूत भी माना जाता है। बाद में वर्ष 1835 में महाराजा रणजीत सिंह ने मंदिर के शिखरों पर स्वर्ण पत्तर जड़वाए थे।

गौरतलब है कि IIT मद्रास की टीम ने 27 और 28 मई को मंदिर का प्राथमिक परीक्षण किया था। उस दौरान मंदिर की संरचना में इस्तेमाल पत्थरों के विस्तृत तकनीकी परीक्षण और विश्लेषण की आवश्यकता बताई गई थी। इसी क्रम में अब टीम ने विस्तृत सर्वेक्षण पूरा कर लिया है और इसकी अंतिम रिपोर्ट का इंतजार है।