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महाशिवरात्रि 2026: नवग्रहों की पवित्र लकड़ियों से बने विशेष काष्ठपट्ट पर होगा बाबा विश्वनाथ का विवाह

महाशिवरात्रि पर काशी में बाबा विश्वनाथ और माता गौरा 11 पवित्र लकड़ियों से बने विशेष काष्ठपट्ट पर विराजमान होंगे। नवग्रहों से संबंधित काष्ठों से तैयार यह पट्ट पांच राज्यों की आस्था से जुड़ा है। 13 फरवरी को हल्दी और शिवरात्रि पर विवाह लोकाचार संपन्न होंगे।

 
महाशिवरात्रि 2026
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वाराणसी: देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में इस वर्ष महाशिवरात्रि का पर्व धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं और सांस्कृतिक चेतना के अनूठे संगम के रूप में मनाया जाएगा। इस अवसर पर काशीपुराधीश्वर भगवान विश्वनाथ और माता गौरा नवग्रहों सहित 11 प्रकार की पवित्र लकड़ियों से निर्मित विशेष काष्ठपट्ट पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।

यह विशेष काष्ठपट्ट देश के पांच राज्यों से एकत्र की गई लकड़ियों से तैयार किया गया है। आयोजन स्थल टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर तैयारियां अंतिम चरण में हैं।

13 फरवरी को हल्दी, महाशिवरात्रि पर विवाह लोकाचार

महाशिवरात्रि से पूर्व 13 फरवरी को हल्दी और शगुन के पारंपरिक लोकाचार संपन्न होंगे। वहीं महाशिवरात्रि के दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का विशेष शृंगार, पूजन तथा विवाह की रस्में विधि-विधान से पूरी की जाएंगी। परंपरा के अनुसार चल प्रतिमाओं को काष्ठपट्ट पर विराजमान कर मांगलिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।

नवग्रहों के अनुरूप पवित्र काष्ठों का चयन

आयोजक वाचस्पति तिवारी के अनुसार काष्ठपट्ट का निर्माण नवग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से किया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक है।

नवग्रहों के अनुरूप - 
•    सूर्य के लिए अर्क (मदार)
•    चंद्र के लिए पलाश
•    मंगल के लिए खदिर (खैर)
•    बुध के लिए अपामार्ग
•    गुरु के लिए पीपल
•    शुक्र के लिए औदुम्बर (गूलर)
•    शनि के लिए शमी
•    राहु के लिए दुर्वा
•    केतु के लिए कुशा

इसके अतिरिक्त अक्षोड (अखरोट) और सागवान को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार की लकड़ियों से यह काष्ठपट्ट तैयार किया गया है।

देशभर की आस्था का संगम

उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से लकड़ियां एकत्र की गईं। शिवभक्तों ने इन्हें काशी पहुंचाया। आयोजन से जुड़े संजीव रत्न मिश्र ने बताया कि काशी की परंपरा में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का गहरा संबंध है। यह आयोजन प्रकृति, देवता और मानव जीवन की एकता का प्रतीक है।