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BHU के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता: 47 दुर्लभ बीमारियों की पहचान, 10 नए जीन वेरिएंट भी खोजे

बीएचयू के सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के वैज्ञानिकों ने 47 दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों की पहचान की है। शोध के दौरान 10 नए जीन वेरिएंट भी खोजे गए हैं। वाराणसी और आसपास के जिलों के 300 मरीजों का पंजीकरण कर उन्हें निशुल्क जांच, परामर्श और चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराई गई।

 
BHU के वैज्ञानिकों की बड़ी सफलता
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वाराणसी: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के वैज्ञानिकों ने दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों की पहचान के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स ने अब तक 47 दुर्लभ आनुवंशिक रोगों की पहचान की है। इसके साथ ही शोध के दौरान 10 नए जीन वेरिएंट भी खोजे गए हैं, जो भविष्य में इन बीमारियों के निदान और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

300 मरीजों का पंजीकरण, कई परिवारों को मिली राहत

बच्चों में होने वाली दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियों पर चल रहे राष्ट्रीय मिशन कार्यक्रम के तहत वाराणसी और आसपास के जिलों से करीब 300 मरीजों का पंजीकरण किया गया है। इनमें से कई परिवारों को निशुल्क आनुवंशिक जांच, परामर्श और विशेषज्ञ चिकित्सकीय सलाह का लाभ मिला है।

अधिकांश रोग न्यूरोलॉजिकल विकार से जुड़े

सेंटर फॉर जेनेटिक डिसऑर्डर्स के प्रमुख प्रो. परिमल दास के निर्देशन में चल रहे शोध में जिन 47 दुर्लभ बीमारियों की पहचान हुई है, उनमें अधिकांश न्यूरोलॉजिकल विकार शामिल हैं। इसके अलावा न्यूरोमस्कुलर, नेत्र, हड्डियों और हृदय संबंधी दुर्लभ रोग भी सामने आए हैं।

प्रो. दास ने बताया कि अब तक 47 मरीजों को उनकी आनुवंशिक रिपोर्ट उपलब्ध कराई जा चुकी है, जिसमें 10 नए जीन वेरिएंट की पहचान की गई है। यह खोज भारतीय चिकित्सा अनुसंधान और जेनेटिक साइंस के क्षेत्र में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

भारत सरकार की परियोजना के तहत हो रहा शोध

यह शोध विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (DBT) द्वारा स्वीकृत अखिल भारतीय परियोजना "मिशन प्रोग्राम ऑन पीडियाट्रिक रेयर डिसऑर्डर्स" के अंतर्गत किया जा रहा है। परियोजना का उद्देश्य दुर्लभ बाल्यकालीन बीमारियों के आनुवंशिक कारणों की पहचान करना और प्रभावित परिवारों को समय पर सही निदान उपलब्ध कराना है।

जागरूकता अभियान से बढ़ी लोगों की समझ

प्रो. परिमल दास ने बताया कि वर्ष 2023 से अब तक वाराणसी और आसपास के जिलों में पांच जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य लोगों को आनुवंशिक बीमारियों के प्रति जागरूक करना और उनसे जुड़ी भ्रांतियों को दूर करना है।

शोध के माध्यम से जनसंख्या स्तर पर दुर्लभ आनुवंशिक विकारों के कारणों को समझने और समय रहते उनकी पहचान सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है।

100 से अधिक डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी हुए प्रशिक्षित

परियोजना के तहत डॉक्टरों, रेजिडेंट चिकित्सकों, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल कर्मियों सहित 100 से अधिक स्वास्थ्यकर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है। शोधकर्ता डॉ. ऋतु दीक्षित और दीपिका मारू वर्ष 2024 से लगातार मरीजों के पंजीकरण, आनुवंशिक डेटा विश्लेषण, परामर्श और जागरूकता कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।

सही निदान से परिवारों को मिल रही नई दिशा

परियोजना के सह-प्रधान अन्वेषक डॉ. अशोक कुमार ने बताया कि किसी दुर्लभ बीमारी के आनुवंशिक कारण की पुष्टि होने से परिवारों की अनिश्चितता समाप्त होती है। सही निदान मिलने पर माता-पिता को बीमारी की वास्तविक वजह पता चलती है और वे अनावश्यक जांच व इलाज पर होने वाले खर्च और समय की बचत कर पाते हैं। उन्होंने कहा कि आनुवंशिक जांच की रिपोर्ट भविष्य में परिवार नियोजन और अगली गर्भावस्था की बेहतर योजना बनाने में भी मददगार साबित होती है।