Movie prime

मदर्स डे पर आंखें नम कर देने वाली कहानी : बेटी ने मां को दिया कंधा, आखिरी सफर में भी अकेले निभाया बेटे का फर्ज

 
मदर्स डे
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

वाराणसी। भईया… मेरी मां का प्रवाह करवा दीजिए… ये शब्द उस बेटी के थे, जो वाराणसी के कबीरचौरा अस्पताल में 8 घंटे तक अपनी मृत मां का शव लेकर रोती रही। न तो मां को अंतिम विदाई देने के पैसे थे, न कंधा देने को कोई अपना। यह कहानी है सूजाबाद पड़ाव की रहने वाली सुनीता की, जिसके सिर से पहले पिता का साया हटा, फिर शादी के बाद पति ने छोड़ा...मायके लौटी तो मां और भाई ही उसकी दुनिया बने, लेकिन कुछ सालों बाद भाई भी इस दुनिया को छोड़कर चला गया।

सुनीता ने आर्थिक तंगी और अकेलेपन के बावजूद हालात के आगे घुटने नहीं टेके, लेकिन जिसके लिए जी रही थी उस मां की आंचल की छांव भी हट गई। बीते शुक्रवार की रात सुनीता की मां रुकमणी देवी (65) का कबीरचौरा हॅास्पिटल में बीमारी के चलते निधन हो गया। मां के जाने के बाद मानो सुनीता की पूरी दुनिया ही उजड़ गई।

दूसरों के घरों में करने लगी काम

सुनीता ने बाताया कि उसकी मां ही उसकी दुनिया थी। दो सालों से दोनों पड़ाव इलाके में किराए के छोटे से मकान में रह रही थी। मां बीमार रहती थी और सुनीता दिन-रात उनकी सेवा में लगी रहती थी। घर चलाने के लिए उसने दूसरे घरों में झाड़ू-पोछा और घरेलू काम करना शुरू किया। जो थोड़े बहुत पैसे मिलते, उसी से मां का इलाज, दवा और दोनों का गुजारा चलता था।

मां के जाने के बाद टूट गई सुनीता

दर्द सिर्फ मां को खोने का नहीं था, बल्कि अंतिम संस्कार के लिए पैसे तक उसके पास नहीं थे। वह अस्पताल में रो-रोकर लोगों से मदद की गुहार लगा रही थी।

मदद के लिए आगे आए अमन कबीर

इसी दौरान गरीबों की मदद के लिए पहचाने जाने वाले काशी के समाजसेवी अमन कबीर (Aman Kabir) को इस घटना की जानकारी मिली। वह तुरंत अस्पताल पहुंचे। सुनीता की हालत देखकर उनका दिल भी पसीज गया। रोते हुए सुनीता ने कहा, भईया… मेरी मां का प्रवाह करवा दीजिए, मेरे पास पैसे नहीं हैं। यह सुनकर अमन कबीर ने बिना देर किए पूरी जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। अमन कबीर ने हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार मणिकर्णिका घाट पर सुनीता की मां का अंतिम संस्कार करवाया।



सुनीता ने अपनी मां की अर्थी को कंधा दिया और फिर मुखाग्नि देकर बेटे का फर्ज निभाया। वहां मौजूद हर शख्स की आंखें नम हो गईं।

जब कोई अपना नहीं था, तब एक गैर ने भाई बनकर साथ दिया

अंतिम संस्कार के बाद सुनीता ने नम आंखों से अमन कबीर का धन्यवाद किया। उसने कहा कि जब उसका कोई अपना साथ देने वाला नहीं था, तब अमन ने भाई बनकर उसका हाथ थामा।

...



मदर्स डे पर सामने आई यह कहानी सिर्फ एक बेटी के संघर्ष की नहीं, बल्कि मां-बेटी के उस रिश्ते की मिसाल है, जहां बेटी ने हर परिस्थिति में मां का सहारा बनकर बेटे का फर्ज निभाया।