नागरीप्रचारिणी सभा स्थापना दिवस: दास्तानगोई, ‘तीन ताल’ और दुर्लभ धरोहरों ने बांधा समां
वाराणसी। नागरीप्रचारिणी सभा के स्थापना दिवस समारोह में साहित्य, संस्कृति, संवाद और विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिला। समारोह के अंतर्गत आयोजित दास्तानगोई, लोकप्रिय कार्यक्रम ‘तीन ताल’ की विशेष प्रस्तुति तथा सभा की अमूल्य धरोहरों के प्रदर्शन ने बड़ी संख्या में पहुंचे साहित्यप्रेमियों और युवाओं को आकर्षित किया।
कार्यक्रम की शुरुआत बहुचर्चित दास्तानगोई से हुई, जिसमें सुप्रसिद्ध दास्तानगो हिमांशु वाजपेयी और डॉ. प्रज्ञा ने कबीर, बनारस और लखनऊ की सांस्कृतिक परंपराओं को अपने विशिष्ट अंदाज़ में जीवंत कर दिया। प्रस्तुति में संत कबीर और उनके गुरु स्वामी रामानंद की पंचगंगा घाट पर हुई ऐतिहासिक भेंट, कबीर के जीवन-दर्शन, बनारस की लोक-संस्कृति और साहित्यिक परंपराओं को रोचक किस्सों और प्रसंगों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। जयशंकर प्रसाद, बनारसीदास चतुर्वेदी, कराची हिंदी साहित्य सम्मेलन और अमृतलाल नागर से जुड़े संस्मरणों ने दास्तानगोई को और समृद्ध बनाया।
कबीर के प्रसिद्ध पद “हद अनहद दोऊ तपै, ताको नाम फकीर” की व्याख्या करते हुए फकीरी की व्यापक अवधारणा को सरल और प्रभावशाली ढंग से समझाया गया। लखनऊ की नफ़ासत और बनारस की फक्कड़ संस्कृति के संगम से सजी इस प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने नागरीप्रचारिणी सभा के दुर्लभ संग्रह की सराहना करते हुए कहा कि वर्षों से उनके मन में सभा को देखने की इच्छा थी, जो अब पूरी हुई। उन्होंने कहा कि यहां संरक्षित धरोहरों और संग्रहों को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाने के लिए नियमित प्रदर्शनियां और सांस्कृतिक आयोजन होने चाहिए। उन्होंने कहा कि जितने अधिक लोग इन धरोहरों को देखेंगे, उतना ही इन्हें संरक्षित करने में किए गए प्रयास सार्थक होंगे।
स्थापना दिवस के दूसरे प्रमुख आकर्षण के रूप में नागरीप्रचारिणी सभा के मुक्ताकाशी मंच पर ‘आज तक रेडियो’ के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘तीन ताल’ की विशेष प्रस्तुति आयोजित की गई। कार्यक्रम में कुलदीप सरदार, खान चा, कमलेश ताऊ और क्रिएटिव प्रोड्यूसर अतुल तिवारी ने समसामयिक विषयों, बनारसियत, जीवन और समाज पर सहज, विनोदी तथा बेबाक संवाद प्रस्तुत किया।
संवाद की शुरुआत काशी और पान के महात्म्य से हुई, जिसमें कई रोचक और हास्यपूर्ण प्रसंग सुनाए गए। खान चा ने पुरानी फिल्मों, गीतों और अपने युवाकाल के संस्मरण साझा कर श्रोताओं को खूब गुदगुदाया, जबकि कमलेश ताऊ ने अपनी चर्चित कविता *‘सब बकवास है’* का नया संस्करण सुनाया। अतुल तिवारी ने चौथे स्वर के रूप में चर्चा को नई दिशा दी। नागरीप्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल भी समय-समय पर चर्चा में शामिल होकर संवाद को और रोचक बनाते रहे।
विशेष बात यह रही कि कार्यक्रम में जौनपुर, बहराइच, सुल्तानपुर, भदोही, मिर्जापुर, सोनभद्र, प्रयागराज और रीवा सहित विभिन्न शहरों से पहुंचे श्रोताओं को भी खुलकर बातचीत का अवसर मिला। किसी ने कार्यक्रम की प्रशंसा की, किसी ने सुझाव दिए और कुछ लोगों ने अपने प्रश्न रखे, जिनका प्रस्तोताओं ने आत्मीयता से उत्तर दिया।
समारोह के दौरान प्रख्यात कला-संग्राहक श्रीरूप रे चौधुरी ने सभा को 25 मूल्यवान चित्र भेंट किए। इनमें शैलेन्द्र नाथ डे, नंदलाल बोस और उस्ताद शारदा प्रसाद जैसे प्रतिष्ठित कलाकारों की कृतियां शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सुंदर कला सदैव आनंद देती है और उसे उसके मूल स्वरूप में संरक्षित रखना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोग उसका अवलोकन कर सकें।
कार्यक्रम में डॉ. निशांत ने नागरीप्रचारिणी सभा के विशाल साहित्यिक अभिलेखागार की जानकारी देते हुए बताया कि यहां 26 से 27 हजार से अधिक साहित्यिक पांडुलिपियां, पत्र-पत्रिकाएं और महत्वपूर्ण दस्तावेज संरक्षित हैं। इनमें भारतेन्दु हरिश्चंद्र सहित अनेक साहित्यकारों से जुड़ी पारिवारिक और साहित्यिक विरासत का दुर्लभ संग्रह सुरक्षित है।
पूरे आयोजन में साहित्य, कला, इतिहास, संवाद और सांस्कृतिक चेतना का ऐसा समागम देखने को मिला जिसने नागरीप्रचारिणी सभा की गौरवशाली परंपरा और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता को एक बार फिर रेखांकित किया।
