सारनाथ में श्रद्धा का सागर: 2570वीं जयंती पर बुद्ध के अस्थि दर्शन, 5000 दीपों से जगमगाएगा मूलगंध कुटी विहार
बुद्ध पूर्णिमा पर वाराणसी के सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार में भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेष के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचे। 2570वीं जयंती पर धम्म यात्रा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और 5000 दीपों से मंदिर को सजाया जाएगा, जिससे आस्था का भव्य दृश्य देखने को मिलेगा।
वाराणसी: काशी में बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धा और आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिल रहा है। वाराणसी के सारनाथ स्थित मूलगंध कुटी विहार में भगवान बुद्ध के पवित्र अस्थि अवशेष के दर्शन के लिए देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। भगवान बुद्ध की 2570वीं जयंती पर की आयोजन भी होंगे। सुबह 6:30 बजे से दर्शन की शुरुआत हुई, जो पूर्व निर्धारित समय तक जारी रहेगी। इसके बाद पवित्र अस्थि अवशेष को सुरक्षित स्थान पर रख दिया जाएगा।
बुद्ध पूर्णिमा: जन्म, ज्ञान और परिनिर्वाण का दिन
बौद्ध परंपरा में बुद्ध पूर्णिमा का विशेष महत्व है, क्योंकि इसी दिन भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति और परिनिर्वाण- तीनों घटनाएं हुई थीं। यही कारण है कि यह दिन अनुयायियों के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। मंदिर परिसर में सुबह विश्व शांति के लिए विशेष पूजा-अर्चना भी की गई, जिसमें बड़ी संख्या में भिक्षु और श्रद्धालु शामिल हुए।

5000 दीपों से जगमगाएगा मंदिर, धम्म यात्रा का आयोजन
बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर शाम को मंदिर को 5000 दीपों से सजाया जाएगा, जिससे पूरा परिसर दिव्य आभा से आलोकित होगा। इसके साथ ही दोपहर बाद कचहरी से एक भव्य धम्म यात्रा निकाली जाएगी, जो मंदिर परिसर तक पहुंचेगी। इसके बाद धम्म सभा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और धम्मदेशना का आयोजन किया जाएगा।
श्रद्धालुओं के लिए विशेष भोजन व्यवस्था
इस मौके पर लगभग 70 हजार बौद्ध अनुयायियों के लिए भोजन की व्यवस्था की गई है। महाबोधि सोसाइटी परिसर के पास सुबह 10 बजे से रात 10 बजे तक भोजन वितरण (भोजन दान) जारी रहेगा, ताकि दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं को किसी तरह की असुविधा न हो।
1931 से सारनाथ में सुरक्षित हैं पवित्र अस्थि अवशेष
इतिहास के अनुसार, भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनकी अस्थियों को विभिन्न स्थानों पर स्तूपों में रखा गया था। बाद में सम्राट अशोक ने इन अस्थियों को विभाजित कर पूरे देश में स्थापित कराया।
इन्हीं में से एक पवित्र अस्थि अवशेष वर्ष 1931 में सारनाथ लाया गया, जिसे आज भी मूलगंध कुटी विहार में सुरक्षित रखा गया है। यह स्थल विश्वभर के बौद्ध अनुयायियों के लिए विशेष आस्था का केंद्र है।
सारनाथ: बौद्ध धर्म का प्रथम उपदेश स्थल
वाराणसी का सारनाथ बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में शामिल है। माना जाता है कि ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने यहीं से अपने उपदेश की शुरुआत की थी। यह स्थान न केवल बौद्ध धर्म, बल्कि जैन धर्म के लिए भी पवित्र माना जाता है, जहां आध्यात्मिक शांति और इतिहास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।
