मुहर्रम पर BHU से नरिया कर्बला तक निकला पारंपरिक ताजिया जुलूस, इमाम हुसैन की शहादत को दी गई श्रद्धांजलि
वाराणसी: मुहर्रम के मौके पर शुक्रवार को वाराणसी में शिया मुस्लिम समुदाय ने इमाम हुसैन की शहादत की याद में ताजिया, जियारत और मातम के साथ पारंपरिक जुलूस निकाले। शहर के कई इलाकों में 'या हुसैन' की सदाएं गूंजती रहीं। इसी दौरान छित्तूपुर ग्राम सभा का ऐतिहासिक ताजिया जुलूस काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) परिसर से होकर नरिया स्थित कर्बला पहुंचा, जहां धार्मिक परंपरा के अनुसार ताजिए को सुपुर्द-ए-खाक किया गया।
BHU से निकलने वाली परंपरा आज भी कायम
छित्तूपुर का यह ताजिया जुलूस वाराणसी की सबसे पुरानी धार्मिक परंपराओं में माना जाता है। ताजियादारों का कहना है कि यह परंपरा काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना से भी पहले की है। जब विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ, तब भी इस मार्ग से ताजिया निकालने की परंपरा को बरकरार रखा गया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय ने भी इस पारंपरिक मार्ग को जारी रखने की अनुमति दी थी। तभी से यह जुलूस हर वर्ष तय प्रोटोकॉल के तहत BHU परिसर से होकर नरिया कर्बला तक पहुंचता है।
नरिया कर्बला में हुई रस्म-ए-सुपुर्द-ए-खाक
जुलूस में शामिल लोग ताजिए के साथ मातम करते हुए नरिया कर्बला पहुंचे। यहां धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार ताजिए को सुपुर्द-ए-खाक किया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे और इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए दुआएं की गईं।
अलग-अलग तरह के ताजिए बने आकर्षण का केंद्र
इस बार भी वाराणसी में निकले ताजियों ने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। बुर्राख का ताजिया, रांगे का ताजिया, नगीने वाला ताजिया, पीतल का ताजिया, मोती वाला ताजिया, फूलों से सजा ताजिया और चपरखट शैली के ताजिए विशेष आकर्षण रहे। कारीगरों ने महीनों की मेहनत से इन ताजियों को तैयार किया था। इन्हें देखने के लिए जुलूस मार्ग पर बड़ी संख्या में लोग जुटे रहे।
पूरे मार्ग पर रही कड़ी सुरक्षा
मुहर्रम को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए थे। जुलूस के पूरे रूट पर पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी तैनात रहे। संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त पुलिस बल लगाया गया और सीसीटीवी कैमरों समेत अन्य निगरानी व्यवस्थाओं के जरिए पूरे आयोजन पर नजर रखी गई।
