Movie prime

गंगा की लहरों पर गूंज रही कजरी की मिठास, पद्मश्री मालिनी अवस्थी देश-विदेश के 56 विद्यार्थियों को दे रहीं लोकसंगीत की शिक्षा
 

 
 गंगा की लहरों पर गूंज रही कजरी की मिठास, पद्मश्री मालिनी अवस्थी देश-विदेश के 56 विद्यार्थियों को दे रहीं लोकसंगीत की शिक्षा
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

वाराणसी। सावन के पावन महीने में काशी की आध्यात्मिक आभा इन दिनों लोकसंगीत की मधुर स्वर लहरियों से और भी अलौकिक हो गई है। गंगा की लहरों के बीच क्रूज पर आयोजित विशेष कजरी कार्यशाला में पद्मश्री लोकगायिका मालिनी अवस्थी देश-विदेश से आए 56 विद्यार्थियों को कजरी गायन की बारीकियां सिखा रही हैं। पांच दिवसीय इस अनूठी कार्यशाला का उद्देश्य नई पीढ़ी को पूर्वांचल की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा से जोड़ना और कजरी की विरासत को संरक्षित करना है।

मालिनी अवस्थी ने बताया कि बाबा विश्वनाथ की कृपा से पिछले छह वर्षों से आषाढ़ और सावन के दौरान कजरी कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है। शुरुआत में तीन कार्यशालाएं मिर्जापुर में आयोजित हुई थीं, जिसे कजरी का उद्गम स्थल माना जाता है। इसके बाद चुनार, चंदौली और राजदरी जैसे प्राकृतिक स्थलों पर आयोजन हुआ और इस वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर काशी को चुना गया है।

प्रकृति के बीच संगीत साधना

मालिनी अवस्थी का मानना है कि कजरी केवल गायन नहीं, बल्कि प्रकृति को महसूस करने की कला है। उनका कहना है कि वर्षा की बूंदें, बादलों की गर्जना, पत्तों की सरसराहट और गंगा की लहरों का संगीत ही कजरी की आत्मा है। इसी कारण दो दिन राजदरी और तीन दिन गंगा के बीच क्रूज पर कार्यशाला आयोजित की गई है। विद्यार्थी यहीं रहते हैं, भोजन करते हैं, अभ्यास करते हैं और दिनभर संगीत साधना में जुटे रहते हैं।

देश-विदेश से पहुंचे 56 प्रतिभागी

इस बार कार्यशाला में सिंगापुर सहित देश के विभिन्न राज्यों और शहरों—भागलपुर, हैदराबाद, उदयपुर, अहमदाबाद, प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर, दिल्ली, आगरा, गोरखपुर और सिवान—से 56 प्रतिभागी शामिल हुए हैं। प्रतिभागियों की उम्र 18 वर्ष से लेकर 70 वर्ष से अधिक तक है। खास बात यह है कि 60 से 75 वर्ष आयु वर्ग की महिलाएं भी पूरे उत्साह और समर्पण के साथ कजरी सीख रही हैं।

युवाओं में लोकसंगीत के प्रति बढ़ा उत्साह

मालिनी अवस्थी ने कहा कि अक्सर युवाओं को लेकर कई तरह की धारणाएं बनाई जाती हैं, लेकिन इस कार्यशाला में शामिल अधिकांश प्रतिभागी 18 से 26 वर्ष के हैं। उनमें लोकसंगीत सीखने का अद्भुत समर्पण, अनुशासन और विनम्रता देखने को मिल रही है। इससे विश्वास मजबूत होता है कि भारतीय लोक परंपराओं का भविष्य सुरक्षित हाथों में है।

संगीत के साथ योग और जीवन दर्शन

यह कार्यशाला केवल गायन तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों को योग, ध्यान और एकाग्रता का भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है। मालिनी अवस्थी के अनुसार, एक अच्छा गायक बनने के लिए स्वर के साथ मानसिक संतुलन और आत्मिक शांति भी जरूरी है। कार्यशाला के दौरान प्रत्येक विद्यार्थी से व्यक्तिगत संवाद भी किया जाता है, जहां उन्हें संगीत, करियर और जीवन से जुड़े विषयों पर मार्गदर्शन मिलता है।

बारिश में भीगकर गाने का अलग अनुभव

मालिनी अवस्थी ने एक यादगार अनुभव साझा करते हुए बताया कि गंगा किनारे अभ्यास के दौरान अचानक बारिश शुरू हो गई, लेकिन कोई भी विद्यार्थी अंदर नहीं गया। सभी बारिश में भीगते हुए कजरी गाते रहे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, "कजरी गायन में न छाते की जरूरत होती है और न रेनकोट की। भीगकर गाने का जो आनंद है, वही इस लोकसंगीत की आत्मा है।"

गुरु पूर्णिमा पर होगा समापन

पांच दिवसीय कार्यशाला का समापन गुरु पूर्णिमा के अवसर पर होगा। सुबह 10 बजे सभी विद्यार्थी मंच पर अपनी सीखी हुई कजरियों की प्रस्तुति देंगे। मालिनी अवस्थी ने संगीत प्रेमियों से इस विशेष आयोजन में शामिल होने की अपील करते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा से बेहतर अवसर कोई नहीं हो सकता, जब गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान देकर अपने गुरुओं को श्रद्धांजलि अर्पित करे।

पूर्वांचल की अमूल्य धरोहर है कजरी

मालिनी अवस्थी ने कहा कि कजरी की सबसे मजबूत जड़ें पूर्वांचल की धरती में हैं। काशी, मिर्जापुर, चुनार और चंदौली में आज भी कजरी के अखाड़े गुरु-शिष्य परंपरा के तहत इस लोकविधा को जीवंत बनाए हुए हैं। उन्होंने भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमधन व्यास, अंबिकादत्त व्यास, हीरालाल यादव, गुल्लू यादव, पंडित राम कैलाश यादव, उर्मिला श्रीवास्तव, सिद्धेश्वरी देवी और गिरिजा देवी जैसी विभूतियों के योगदान को भी याद किया।

अपने जीवन की पहली कजरी को याद करते हुए मालिनी अवस्थी ने कहा कि आज भी उन्हें उसके बोल याद हैं—

"बरसे सावनवा के बैरी बदरवा, कजरवा धुल-धुल जाए मोर राम… अरे रामा, कृष्ण बने मनिहारन…"