ऋषि पंचमी पर भारतेन्दु की दुर्लभ रचनाओं का लोकार्पण, ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ का हुआ विमोचन
वाराणसी। ऋषि पंचमी के पावन अवसर पर हिंदी नवजागरण के अग्रदूत और काशी के तेजस्वी साहित्यिक व्यक्तित्व बाबू भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की दुर्लभ एवं अप्रकाशित रचनाओं के संकलन ‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ का विशेष लोकार्पण किया गया। पिलग्रिम्स पब्लिशिंग द्वारा प्रकाशित यह ग्रंथ भारतेन्दु युग की साहित्यिक चेतना, पुष्टिमार्गीय भक्ति और काशी की समृद्ध संगीत परंपरा का महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
ग्रंथ में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र तथा उनके पिता बाबू गोपाल चन्द्र ‘गिरिधर दास’ की अप्रकाशित एवं दुर्लभ रचनाओं के साथ वसंत, धमाल, होली, झूले, प्रातः, स्तुति, पुष्टिमार्गीय पद और भीष्म स्तुति सहित अनेक रचनाएं संकलित हैं। महाकवि जयदेव कृत ‘गीत गोविंद’ की कुछ रचनाओं का भारतेन्दु द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद भी इस पुस्तक की विशेषता है।
इसके अतिरिक्त काशी की प्रसिद्ध समकालीन गायिकाओं हुन्ना बाई, मल्लिका और माधवी की रचनाओं तथा हुन्ना बाई के आग्रह पर भारतेन्दु द्वारा लिखे गए पदों को भी इसमें शामिल किया गया है। भारतेन्दु वंशज दीपमणि राजकुमार द्वारा संकलित यह ग्रंथ साहित्य, संगीत, भक्ति और सांस्कृतिक इतिहास के विविध आयामों को एक साथ प्रस्तुत करता है।
विद्वानों और कला-जगत की गरिमामयी उपस्थिति
ग्रंथ का लोकार्पण प्रसिद्ध संगीतकार एवं व्यवसायी श्री भागीरथ जालान के कर-कमलों से हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के औषधि विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष पद्मश्री डॉ. कमलाकर त्रिपाठी रहे।
कार्यक्रम का संचालन एवं पुस्तक-विवेचन यूपी कॉलेज के हिंदी विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. राम सुधर सिंह ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधान मंत्री श्री व्योमेश शुक्ल ने की। इस अवसर पर पिलग्रिम्स पब्लिशिंग के संस्थापक श्री रामानंद तिवारी सहित काशी के कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
काशी की सांस्कृतिक स्मृति को पुनः प्रकाशित करता ग्रंथ
‘भारतेन्दु काव्य कुमुदिनी’ का प्रकाशन काशी की बहुआयामी सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्पाठ का अवसर है। इसमें साहित्य, संगीत, भक्ति और लोक-सांस्कृतिक जीवन के उन पहलुओं को सामने लाया गया है, जो भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के रचनात्मक व्यक्तित्व और उनके पारिवारिक साहित्यिक संस्कारों से गहराई से जुड़े हैं।
