भारतीय मूल्यों से परिमार्जित और परिष्कृत हो शोध: प्रो. आनन्द कुमार त्यागी
Varanasi : महामना मदनमोहन मालवीय हिन्दी पत्रकारिता संस्थान, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ द्वारा आयोजित एवं भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित दस दिवसीय शोध पद्धति पाठ्यक्रम का शुभारंभ सोमवार को हुआ। यह पाठ्यक्रम ‘सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शोधार्थियों के लिए शोध पद्धति और अकादमिक लेखन’ विषय पर 2 से 11 फरवरी तक आयोजित किया जा रहा है। कार्यक्रम का उद्घाटन सत्र डॉ. भगवान दास केन्द्रीय पुस्तकालय के समिति कक्ष में संपन्न हुआ, जिसकी अध्यक्षता काशी विद्यापीठ के कुलपति प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने की।

पत्रकारिता में मानवीय मूल्यों का संरक्षण बड़ी चुनौती
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आनन्द कुमार त्यागी ने कहा कि पत्रकारिता का समाज पर गहरा और व्यापक प्रभाव पड़ता है। तकनीक के इस दौर में पत्रकारिता को मानव कल्याण से जोड़ना एक बड़ी चुनौती बन गया है। उन्होंने कहा कि तकनीकी उपलब्धता ने शोध को आसान तो बनाया है, लेकिन मानवीय और गुणवत्तापरक शोध करना अब अधिक कठिन हो गया है। प्रो. त्यागी ने जोर देते हुए कहा कि शोध भारतीय मूल्यों से निहित, परिमार्जित और परिष्कृत होना चाहिए। यह कार्यशाला प्रतिभागियों को शोध की दृष्टि से समृद्ध करेगी।

शोध भारत का स्वभाव है: प्रो. जगदीश उपासने
मुख्य अतिथि, पांचजन्य के पूर्व संपादक एवं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. जगदीश उपासने ने भारतीय ज्ञान परंपरा की चर्चा करते हुए बौधायन, आर्यभट्ट, नागार्जुन और पाणिनि जैसे महान विद्वानों का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि शोध भारत का स्वभाव रहा है, लेकिन वर्तमान समय में शोध प्रक्रिया से समाज का एक बड़ा वर्ग पीछे छूट रहा है। लैंगिक समानता, सामाजिक एकता और जेन-जी (GEN Z) जैसे विषयों पर गंभीर शोध की आवश्यकता है। प्रो. उपासने ने कहा कि शोध में समावेशी विकास को अनिवार्य रूप से शामिल करना होगा।
प्रश्न करना ही शोध की बुनियाद: प्रो. हरिकेश सिंह
सारस्वत अतिथि एवं जय प्रकाश नारायण विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह ने कहा कि शोध भारतीय ज्ञान परंपरा का प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण अंग रहा है। उन्होंने दुर्गा सप्तशती के उदाहरण के माध्यम से शोध के दार्शनिक पक्ष को रेखांकित किया। प्रो. सिंह ने कहा कि शोध का मूल आधार प्रश्न करना है। शोध तत्व मीमांसा, ज्ञान मीमांसा से होते हुए मूल्य मीमांसा तक जाता है। उन्होंने शोध के चार ‘Q’—क्वेस्ट (जिज्ञासा), क्वेश्चन (प्रश्न), क्वॉसेंट (बुद्धिमत्ता गुणांक) और क्वालिटी (गुणवत्ता)—को महत्वपूर्ण बताया और कहा कि शोध का उद्देश्य राष्ट्रधर्म होना चाहिए।
तकनीक ने शोध को आसान और कठिन दोनों बनाया
तकनीकी सत्र के मुख्य वक्ता, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के प्रो. एम. शफे किदवई ने सामाजिक विज्ञान में अनुसंधान की प्रकृति, उद्देश्य और भारत की अनुसंधान परंपराओं पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि तकनीक ने शोध को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन मानवीय पक्ष कमजोर हुआ है। एआई के माध्यम से डाटा तो आसानी से मिल रहा है, पर जनसंचार और सामाजिक विज्ञान के शोध में मानवीय संवेदनाओं को बनाए रखना जरूरी है।
देशभर से 30 शोधार्थी ले रहे हैं भाग
इस दस दिवसीय शोध पद्धति पाठ्यक्रम में देश के विभिन्न प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से चयनित 30 शोधार्थी भाग ले रहे हैं, जो सामाजिक विज्ञान और मानविकी के क्षेत्र में शोधरत हैं। कार्यक्रम में स्वागत पाठ्यक्रम निदेशक एवं संस्थान निदेशक डॉ. नागेन्द्र कुमार सिंह ने किया। संचालन डॉ. प्रभा शंकर मिश्र तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ. वशिष्ठ नारायण सिंह ने किया।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. के.के. सिंह, डॉ. दयानंद, डॉ. नागेंद्र पाठक, डॉ. श्रीराम त्रिपाठी, डॉ. शिवजी सिंह, डॉ. मुंकेश कुमार शुक्ल, डॉ. अमित कुमार सिंह, विजय सिंह, डॉ. अजय वर्मा, डॉ. वैष्णवी शुक्ला, डॉ. चन्द्रशील पाण्डेय, खुश्बू सिंह, अरविंद मिश्र, गुरू प्रकाश सिंह, देवेन्द्र गिरि, गणेश राय, आकाश सिंह, सपना तिवारी, डाली विश्वकर्मा, अतुल उपाध्याय, पुलकित, स्तुति, समर, शाजिया, जूली, जाह्नवी, अनुष्का, रिया, हर्षिता, शिवांगी, मनीष आदि उपस्थित रहे।
