संस्कृत के संरक्षण और वैश्विक विस्तार पर मंथन, डॉ. निशंक से मिले सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति
Varanasi : देववाणी संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन, शोध, अनुवाद और वैश्विक प्रसार को नई गति देने के उद्देश्य से सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने सर्किट हाउस में उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं संस्कृत और भारतीय संस्कृति के समर्थक डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ से आत्मीय भेंट की। इस दौरान संस्कृत भाषा के उन्नयन, विकास और उसे जनजीवन से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा हुई।
पुष्पगुच्छ और पुस्तकों से किया अभिनंदन
भेंट के दौरान कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने पुष्पगुच्छ भेंट कर डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का स्वागत एवं अभिनंदन किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर से प्रकाशित ‘लोक विद्या विमर्श’ और ‘लोकमता गंगा’ की प्रतियां भी उन्हें भेंट कीं। इन प्रकाशनों के माध्यम से विश्वविद्यालय की लोकज्ञान, लोकपरंपरा, संस्कृति और भारतीय ज्ञान-चेतना को अकादमिक विमर्श से जोड़ने की प्रतिबद्धता भी सामने आई।

प्राचीन ग्रंथों के शोध और अनुवाद पर जोर
वार्ता के दौरान संस्कृत के प्राचीन एवं समृद्ध ग्रंथों के संरक्षण, शोध और पुनर्पाठ पर विशेष बल दिया गया। साथ ही इन ग्रंथों में निहित ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में उपयोगी बनाने तथा देश की विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद के माध्यम से व्यापक समाज तक पहुंचाने की आवश्यकता पर भी विचार हुआ।
बैठक में संस्कृत को केवल अध्ययन की भाषा के बजाय भारत की ज्ञान-संपदा, दर्शन, विज्ञान, अध्यात्म, संस्कृति और जीवन-मूल्यों की जीवंत संवाहक भाषा के रूप में जन-जन तक पहुंचाने पर जोर दिया गया।
आधुनिक तकनीक और जनभागीदारी से नई पीढ़ी तक पहुंचे संस्कृत ज्ञान
डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने कहा कि संस्कृत भारतीय ज्ञान-परंपरा की मूल चेतना और सांस्कृतिक अस्मिता की सशक्त आधारभूमि है। संस्कृत के विशाल वाङ्मय में निहित ज्ञान को शोध, अनुवाद, आधुनिक तकनीक और व्यापक जनसहभागिता के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की आवश्यकता है।
उन्होंने संस्कृत के वैश्विक विस्तार के लिए विश्वविद्यालयों, विद्वानों और शोधकर्ताओं के बीच व्यापक सहयोग स्थापित करने पर भी बल दिया।

लोकजीवन और आधुनिक शिक्षा से जोड़ी जाएगी संस्कृत
कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की आत्मा और भारतीय ज्ञान-परंपरा की अक्षय धारा है। विश्वविद्यालय का संकल्प है कि संस्कृत के ज्ञान-वैभव को विश्वविद्यालयों की सीमाओं से आगे ले जाकर जनभावना से जोड़ा जाए और आधुनिक माध्यमों के जरिए विश्व के सामने प्रस्तुत किया जाए।
उन्होंने कहा कि संस्कृत, संस्कृति और भारतीय ज्ञान-परंपरा के विभिन्न आयामों को लोकजीवन, युवा पीढ़ी, आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीक और वैश्विक अकादमिक विमर्श से जोड़ते हुए एक समग्र कार्य-मानचित्र तैयार किया जाएगा। बैठक में हुई चर्चा को शीघ्र ही ठोस कार्ययोजनाओं में बदलकर क्रियान्वित करने का प्रयास किया जाएगा।
