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शंकराचार्य का सख्त संदेश—काशी में मृत्यु महोत्सव, शास्त्रविहीन पूजा पर चेतावनी; गो-रक्षा मुद्दे पर सरकार पर निशाना
 

 
 शंकराचार्य का सख्त संदेश—काशी में मृत्यु महोत्सव, शास्त्रविहीन पूजा पर चेतावनी; गो-रक्षा मुद्दे पर सरकार पर निशाना
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वाराणसी। असि स्थित दक्षिणामूर्ति मठ में आयोजित प्राण-प्रतिष्ठा अनुष्ठान के दौरान स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए देव विग्रहों की पूजा-पद्धति को लेकर गंभीर चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि देव विग्रहों से किसी भी प्रकार का खिलवाड़ नहीं करना चाहिए, चाहे वह प्राण-प्रतिष्ठा की प्रक्रिया हो या उसके बाद की राग-भोग सेवा—दोनों ही शास्त्रीय विधानों के अनुरूप होने चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि किसी विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रीय नियमों के अनुसार नहीं हुई हो या वह किसी प्रकार से खंडित हो गया हो, और निर्धारित व्यवस्था का पालन संभव न हो, तो ऐसे विग्रह का दर्शन-पूजन नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में उस देवस्थान का तेज समाप्त हो जाता है और वहां देवत्व का लोप हो जाता है। उन्होंने यहां तक कहा कि ऐसी परिस्थितियों में विग्रह में नकारात्मक शक्तियों का वास हो सकता है, जिससे पूजा का कुफल मिलता है।

कार्यक्रम के दौरान शंकराचार्य ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार पर भी जोर दिया और कहा कि यह भाषा हमें सुसंस्कृत बनाती है। उन्होंने गो-रक्षा के मुद्दे पर सरकारों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इस विषय पर गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में बयान देते हुए कहा कि गो-रक्षा के वादों को धरातल पर उतारना जरूरी है।

राजनीतिक व्यवस्था पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि आज के समय में राजनेताओं के राजा ही राजगुरु बन गए हैं। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने बताया कि ज्ञानी व्यक्ति भी सच्चा भक्त होता है और भगवान नारायण को प्रथम गुरु बताया।

मृत्यु के विषय पर बोलते हुए शंकराचार्य ने कहा कि मृत्यु एक अटल सत्य है और जन्म के साथ ही सुनिश्चित हो जाती है। उन्होंने कहा कि मृत्यु का शोक नहीं करना चाहिए, विशेषकर काशी में, जहां मृत्यु को भी महोत्सव के रूप में देखा जाता है। उनके अनुसार, मृत्यु पर अत्यधिक शोक इस बात का संकेत है कि संबंध स्वार्थ पर आधारित था, जबकि निस्वार्थ संबंधों में मृत्यु स्वाभाविक लगती है।