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Project Dolphin का दिखा असर! गंगा में बढ़ीं डॉल्फिन, कैथी बना नया बसेरा, पर्यटकों की उमड़ी भीड़

वाराणसी के कैथी से ढकवा गांव के बीच गंगा में डॉल्फिन की संख्या 80 के पार पहुंच गई है। बेहतर संरक्षण, स्वच्छ जल और पर्याप्त भोजन के कारण हर साल इनकी संख्या बढ़ रही है। पर्यटक सुबह-शाम डॉल्फिन की अठखेलियां देखने पहुंच रहे हैं। वन विभाग ने संरक्षण अभियान और तेज किया है।
 
Project Dolphin
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वाराणसी: गंगा की स्वच्छ होती धारा और बेहतर संरक्षण का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। वाराणसी के कैथी से ढकवा गांव के बीच इन दिनों गंगा डॉल्फिन बड़ी संख्या में नजर आ रही हैं। सुबह और शाम के समय ये दुर्लभ जलीय जीव बार-बार पानी की सतह पर आकर अठखेलियां करते दिखाई देते हैं। इस मनमोहक दृश्य को देखने के लिए स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों की भीड़ दिनभर नावों से इस क्षेत्र में पहुंच रही है। कैथी क्षेत्र में अनुकूल वातावरण और संरक्षण के चलते यहां डॉल्फिन की संख्या लगातार बढ़ रही है। वर्तमान में इस क्षेत्र में 80 से अधिक गंगा डॉल्फिन मौजूद हैं।

हर साल करीब 2 प्रतिशत बढ़ रही डॉल्फिन की संख्या

वन विभाग और डॉल्फिन संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक वर्ष 2016 के बाद से कैथी क्षेत्र में डॉल्फिन की आबादी में औसतन 2 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि दर्ज की जा रही है। इसका प्रमुख कारण स्वच्छ जल, पर्याप्त भोजन और सुरक्षित वातावरण माना जा रहा है।

गंगा डॉल्फिन भारत का राष्ट्रीय जलीय जीव है और यह केवल स्वच्छ तथा ऑक्सीजन युक्त जल में ही बेहतर तरीके से जीवित रह सकती है। मौसम, जलस्तर और भोजन की उपलब्धता के अनुसार इसकी गतिविधियों में बदलाव आता रहता है। इसी वजह से कुछ समय में इनकी दृश्यता अधिक हो जाती है।

कभी पलायन को मजबूर थीं डॉल्फिन, अब लौट रही हैं गंगा में

डॉल्फिन मित्र प्रीति कुमारी बताती हैं कि वर्ष 2000 से पहले गंगा अपेक्षाकृत अधिक स्वच्छ थी, इसलिए डॉल्फिनों की संख्या भी काफी ज्यादा थी। लेकिन समय के साथ नदी किनारे आबादी बढ़ी, श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा हुआ और मोटर चालित नावों का संचालन तेज हो गया।

इन कारणों से डॉल्फिनों ने धीरे-धीरे इस क्षेत्र से पलायन करना शुरू कर दिया। अब संरक्षण प्रयासों, बेहतर जल गुणवत्ता और पर्याप्त प्राकृतिक भोजन मिलने से ये फिर से गंगा के इस हिस्से में लौट रही हैं।

मोटर बोट के शोर से दूर, शांत इलाके को बनाया नया बसेरा

विशेषज्ञों के अनुसार गंगा डॉल्फिन सांस लेने के लिए समय-समय पर पानी की सतह पर आती हैं। दिशा और शिकार की पहचान के लिए वे इकोलोकेशन (ध्वनि तरंगों) का उपयोग करती हैं।

मोटर चालित नावों से पैदा होने वाला कंपन और शोर उनकी ध्वनि तरंगों को प्रभावित करता है, जिससे वे असहज महसूस करती हैं। यही कारण है कि डॉल्फिन अब शहर के अधिक शोर वाले हिस्सों से दूरी बनाकर अपेक्षाकृत शांत कैथी क्षेत्र को अपना सुरक्षित ठिकाना बना रही हैं।

ढकवा के गंगा ज्ञान केंद्र में बना डॉल्फिन सेल्फी पॉइंट

कैथी से करीब पांच किलोमीटर पहले स्थित ढकवा गांव में बनाए गए गंगा ज्ञान केंद्र को भी पर्यटकों के आकर्षण का नया केंद्र बनाया गया है। यहां डॉल्फिन से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदर्शित की गई हैं। साथ ही विशेष डॉल्फिन सेल्फी पॉइंट विकसित किया गया है, जहां पर्यटक तस्वीरें खिंचवा सकते हैं। केंद्र में गंगा, जैव विविधता और डॉल्फिन संरक्षण से संबंधित कई पुस्तकों की भी व्यवस्था की गई है।

'प्रोजेक्ट डॉल्फिन' से संरक्षण को मिली नई रफ्तार

प्रभागीय वनाधिकारी निधि चौहान ने बताया कि गंगा डॉल्फिन का संरक्षण विभाग की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार की पहल पर 'प्रोजेक्ट डॉल्फिन' के तहत लगातार काम किया जा रहा है।

उन्होंने बताया कि नाविकों को भी डॉल्फिन दिखाई देने पर तत्काल सूचना देने और उनके प्राकृतिक आवास को नुकसान न पहुंचाने के निर्देश दिए गए हैं। वन विभाग का मानना है कि लगातार संरक्षण और जागरूकता अभियान के कारण ही डॉल्फिन की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हो रही है।