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वाराणसी : INTACH ने आयोजित की बनारस मिनिएचर पेंटिंग कार्यशाला, छात्रों ने सीखी काशी की पारंपरिक कला

 
वाराणसी : INTACH ने आयोजित की बनारस मिनिएचर पेंटिंग कार्यशाला, छात्रों ने सीखी काशी की पारंपरिक कला
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Varanasi : इंटैक (INTACH) वाराणसी चैप्टर एवं लिटिल फ्लावर हाउस, नगवा के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को बनारस मिनिएचर पेंटिंग कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला इंटैक वाराणसी के सहयोग और एचईसीएस डिवीजन, इंटैक दिल्ली के समर्थन से आयोजित हुई, जिसमें विद्यार्थियों को काशी की समृद्ध कलात्मक विरासत और पारंपरिक भारतीय कला से रूबरू कराया गया।

कार्यक्रम की शुरुआत इंटैक वाराणसी चैप्टर के संयोजक अशोक कपूर ने की। उन्होंने विद्यार्थियों को कार्यशाला के उद्देश्य, वाराणसी की सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक कलाओं के संरक्षण के महत्व की जानकारी दी।

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विद्यार्थियों ने सीखी बनारस मिनिएचर पेंटिंग की बारीकियां

कार्यशाला का संचालन बनारस मिनिएचर कला की पांचवीं पीढ़ी के प्रतिष्ठित कलाकार दया शंकर ने किया। उन्होंने विद्यार्थियों को इस प्राचीन चित्रकला शैली के इतिहास, विशेषताओं और पारंपरिक तकनीकों से परिचित कराया। साथ ही सूक्ष्म रेखांकन, प्राकृतिक रंगों के उपयोग और बारीक ब्रश से चित्र बनाने की विधि का प्रदर्शन किया।

दया शंकर के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने स्वयं मिनिएचर पेंटिंग तैयार कर इस विलुप्त होती कला का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया।

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काशी की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है यह कला

बनारस मिनिएचर पेंटिंग अपनी बेहद बारीक रेखाओं, आकर्षक रंग संयोजन और उत्कृष्ट शिल्पकला के लिए प्रसिद्ध है। इस कला में काशी के घाट, मंदिर, पौराणिक कथाएं, धार्मिक परंपराएं और गंगा तट के सांस्कृतिक जीवन को बेहद खूबसूरती से चित्रित किया जाता है। हालांकि आधुनिक समय में यह पारंपरिक कला विलुप्त होने की कगार पर है और इसे संरक्षित करने वाले कलाकारों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

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कला संरक्षण के लिए ऐसे आयोजन जरूरी

कार्यक्रम के दौरान विद्यालय की उप निदेशिका एवं इंटैक की कला समन्वयक अदिति गुलाटी भी मौजूद रहीं। वहीं विद्यालय की उप प्रधानाचार्या अनीता अग्रवाल ने इंटैक वाराणसी चैप्टर और एचईसीएस डिवीजन, इंटैक दिल्ली का आभार व्यक्त करते हुए विद्यार्थियों को इस विलुप्त होती कला को आगे बढ़ाने और संरक्षित करने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने कहा कि इस तरह की कार्यशालाएं विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ भारतीय कला एवं संस्कृति के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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