जापान के मीनाटो और ताकेशी करेंगे काशी की ऐतिहासिक भरत मिलाप लीला का अध्ययन, जानेंगे 484 साल का इतिहास
काशी की 484 साल पुरानी नाटी इमली भरत मिलाप लीला पर शोध करने जापान से दो शोधार्थी वाराणसी पहुंचे हैं। मीनाटो और ताकेशी ने लीला स्थल का भ्रमण कर इतिहास और परंपराओं की जानकारी जुटाई। दोनों 22 अक्टूबर को होने वाले आयोजन को देखेंगे और करीब 200 साल पुराने रथ का अध्ययन भी करेंगे।
वाराणसी। काशी की ऐतिहासिक नाटी इमली भरत मिलाप लीला की परंपरा अब जापान के शोधार्थियों को भी आकर्षित कर रही है। करीब 484 साल पुरानी इस लीला के इतिहास, धार्मिक महत्व और अनूठी परंपराओं को समझने के लिए जापान से दो शोधार्थी मीनाटो और ताकेशी वाराणसी पहुंचे हैं। दोनों ने लीला स्थल का भ्रमण कर स्थानीय लोगों से बातचीत की और ऐतिहासिक प्रसंगों की जानकारी जुटाई। वे 22 अक्टूबर को होने वाली भरत मिलाप लीला के भी साक्षी बनेंगे।
नाटी इमली मैदान में जुटाई लीला की जानकारी
जापानी शोधार्थियों ने इंटरनेट पर भरत मिलाप लीला के दृश्य देखने के बाद काशी आने का फैसला किया। यहां पहुंचकर उन्होंने नाटी इमली मैदान का निरीक्षण किया और स्थल की वीडियो रिकॉर्डिंग व फोटोग्राफी की। आसपास के लोगों से बातचीत कर उन्होंने लीला के इतिहास, आयोजन की परंपराओं और इससे जुड़े धार्मिक प्रसंगों को समझने की कोशिश की।
श्री चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक पंडित मुकुंद उपाध्याय के मुताबिक, शोधार्थियों को भरत मिलाप पर करीब 20 साल पहले लिखी गई पुस्तक और लीला की वीडियो क्लिप भी उपलब्ध कराई जाएगी, ताकि वे अपने अध्ययन में ऐतिहासिक संदर्भों को शामिल कर सकें।
छह टन का करीब 200 साल पुराना रथ भी आकर्षण का केंद्र
भरत मिलाप लीला की खासियत सिर्फ इसका धार्मिक महत्व नहीं, बल्कि इससे जुड़ी सदियों पुरानी परंपराएं भी हैं। आयोजन में इस्तेमाल होने वाला करीब 200 साल पुराना रथ लगभग छह टन वजनी बताया जाता है। जापानी शोधार्थियों ने इस रथ की बारीकियों और लीला स्थल से जुड़े पहलुओं में भी रुचि दिखाई।
आयोजन का एक और खास पक्ष इसकी अवधि है। भरत मिलाप की मुख्य लीला महज पांच मिनट में संपन्न होती है, लेकिन इसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और दर्शक जुटते हैं। आयोजकों के अनुसार, इस दौरान पांच लाख से अधिक लोगों की मौजूदगी विदेशी शोधार्थियों के लिए विशेष आकर्षण का विषय रही है।
भरत और शत्रुघ्न का भावुक मिलन है लीला की खास पहचान
नाटी इमली की भरत मिलाप लीला में भगवान राम के वनवास से लौटने के बाद भाइयों के मिलन का प्रसंग प्रमुख है। परंपरा के अनुसार, भरत और शत्रुघ्न अपने भाइयों के स्वागत में जमीन पर लेट जाते हैं। यह दृश्य भाईचारे, प्रेम और समर्पण की भावना को दर्शाता है।
काशी में यह आयोजन धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर लोकपर्व का रूप ले चुका है। पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं, स्थानीय समाज की भागीदारी और कुछ ही मिनटों में संपन्न होने वाला मुख्य प्रसंग इसे विशिष्ट बनाते हैं।
अमेरिका, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया के शोधार्थी भी दिखा चुके हैं रुचि
भरत मिलाप लीला और रामनगर की रामलीला पर देश-विदेश में अध्ययन होते रहे हैं। समिति के व्यवस्थापक पंडित मुकुंद उपाध्याय के अनुसार, अमेरिका, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड सहित कई देशों के लोग इस लीला को समझने के लिए काशी आ चुके हैं।
इस बार जापान से आए शोधार्थियों के बाद दिल्ली से भी एक दल के अध्ययन के लिए वाराणसी पहुंचने की जानकारी दी गई है। इससे काशी की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को अकादमिक नजरिये से समझने में रुचि का पता चलता है।
22 अक्टूबर को होने वाली भरत मिलाप लीला के दौरान जापानी शोधार्थी आयोजन को प्रत्यक्ष रूप से देखेंगे। उनके लिए यह अध्ययन काशी की धार्मिक परंपरा, सामुदायिक भागीदारी और ऐतिहासिक सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझने का अवसर होगा।
