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वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का निधन, हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर

 
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का निधन, हिंदी साहित्य जगत में शोक की लहर
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Varanasi : हिंदी साहित्य के प्रख्यात साहित्यकार, हिंदीसेवी और शिक्षाविद् डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का मंगलवार देर रात निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। दो दिन पहले ब्रेन स्ट्रोक आने के बाद उन्हें ककरमत्ता स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उपचार के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से हिंदी साहित्य जगत और शैक्षणिक क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई है।

डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी ने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार को समर्पित किया। वर्ष 1964 से 1975 तक उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा में महत्वपूर्ण सेवाएं दीं। इसके बाद 1975 से प्रयाग स्थित हिंदी साहित्य सम्मेलन से जुड़े रहे और हिंदी साहित्य के विकास में सक्रिय भूमिका निभाते रहे।

वर्ष 2023 में नागरी प्रचारिणी सभा में हुए महत्वपूर्ण प्रशासनिक सुधारों में भी उनकी उल्लेखनीय भूमिका रही। उनके निधन पर नागरी प्रचारिणी सभा में शोकसभा आयोजित कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

चंदौली से शुरू हुआ साहित्यिक सफर

डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का जन्म 1 जून 1937 को चंदौली जिले के रामपुर गांव में हुआ था। उन्होंने सैयदराजा से इंटरमीडिएट की शिक्षा प्राप्त की और डीएवी डिग्री कॉलेज से स्नातक किया। इसके बाद महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से हिंदी में एमए तथा काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) से पीएचडी की उपाधि हासिल की।

कई प्रतिष्ठित सम्मानों से हुए सम्मानित

डॉ. त्रिपाठी को हिंदी साहित्य में उनके योगदान के लिए अनेक सम्मान मिले। वर्ष 2016 में उन्हें 'भारती शिखर सम्मान' से सम्मानित किया गया। वहीं, 2021 में उनकी चर्चित पुस्तक 'हिंदी गद्य का इतिहास' के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें 'किशोरीदास वाजपेयी पुरस्कार' प्रदान किया।

नागरी प्रचारिणी सभा ने जताया शोक

नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने कहा कि डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी ने 2023 में संस्था के प्रशासनिक सुधारों और संगठन को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने अपना अंतिम समय काशी में रहकर हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा को समर्पित किया।

डॉ. केशरी नारायण त्रिपाठी का निधन हिंदी साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनके साहित्यिक योगदान और हिंदी के प्रति समर्पण को लंबे समय तक याद किया जाएगा।