12 साल की उम्र में तेजाब हमला…फिर बनीं BHU की प्रोफेसर, अब मिला पद्मश्री- जानिए कौन है मंगला कपूर
वाराणसी। काशी एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर गौरवान्वित हुई है। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर पद्म सम्मानों की घोषणा की परंपरा के तहत इस बार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से जुड़े दो प्रतिष्ठित शिक्षाविदों के नाम पद्मश्री के लिए घोषित किए गए हैं। इनमें से एक नाम है संगीत विभाग की पूर्व प्राेफेसर मंगला कपूर का जिनकी कहानी आपको झकझोर कर रख देगी साथ ही जिंदगी में सबकुछ हारने के बाद भी एक नए सिरे से जीवन जीने की प्रेरणा भी देगी। तो आइए जानते है कि कौन हैं प्रोफेसर मंगला और उनकी कहानी।
जानें कौन है प्रो. मंगला कपूर
पद्मश्री सम्मान की घोषणा पर प्रो. मंगला कपूर ने भावुक होते हुए कहा कि यह उनके जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने अपनी जीवन यात्रा साझा करते हुए बताया कि मात्र 12 वर्ष की उम्र में उन पर तेजाब से हमला किया गया था। यह हमला किसी व्यक्तिगत गलती की वजह से नहीं, बल्कि व्यवसायिक रंजिश के कारण कराया गया था।
तेजाब हमले के बाद छह साल तक चला इलाज, शारीरिक पीड़ा, मानसिक अवसाद और सामाजिक दूरी उनके जीवन का हिस्सा बन गई। वह बताती हैं कि आज भी उस घटना को याद कर आंखें नम हो जाती हैं और शरीर सिहर उठता है।
माता-पिता का संबल और संगीत बना जीवन की संजीवनी
प्रो. मंगला कपूर कहती हैं कि माता-पिता ने उन्हें टूटने नहीं दिया। पिता से मिली हिम्मत के बल पर उन्होंने संगीत में स्नातक, परास्नातक और पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। उस दौर में आर्थिक स्थिति भी कमजोर थी, कई बार पैदल कॉलेज जाना पड़ता था और समाज से ताने भी सुनने पड़े, लेकिन परिवार के समर्थन ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत दी।
संगीत को उन्होंने इसलिए अपनाया क्योंकि पिता स्वयं सितार वादक थे और उनकी आवाज भी बचपन से सराही जाती रही। वर्ष 1989 में बीएचयू में अध्यापन शुरू कर उन्होंने करीब 30 वर्षों तक विद्यार्थियों को संगीत की शिक्षा दी। पढ़ाई के साथ-साथ मंचीय प्रस्तुतियों के अवसर मिले और धीरे-धीरे उनकी पहचान एक विशिष्ट गायिका के रूप में बनी। संगीत उनके लिए सिर्फ कला नहीं, बल्कि जीवन जीने का आधार बन गया।
कालाजार के खिलाफ लड़ाई में मील का पत्थर बने प्रो. श्याम सुंदर अग्रवाल
बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान (IMS) के मेडिसिन विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. श्याम सुंदर अग्रवाल को कालाजार के निदान और उपचार में ऐतिहासिक योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उन्होंने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की एकल खुराक से कालाजार के प्रभावी इलाज की विधि विकसित की, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भी मान्यता दी।
उनकी विकसित की गई यह एकल खुराक आज भारत के राष्ट्रीय कालाजार नियंत्रण कार्यक्रम का अहम हिस्सा है। इसके अलावा, उन्होंने कालाजार के इलाज में मल्टी ड्रग थेरेपी का पहला सफल परीक्षण किया, जिसे भी WHO ने स्वीकृति दी।
दवाओं और जांच तकनीकों में भी अहम योगदान
प्रो. श्याम सुंदर अग्रवाल ने मिल्टेफोसीन जैसी प्रभावी दवा के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका उपयोग भारत, नेपाल और बांग्लादेश सहित कई देशों में किया गया। साथ ही, पेरेमोमाइसीन और मिल्टेफोसीन के संयोजन को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचाने में उनका योगदान रहा।
कालाजार की पहचान के लिए इस्तेमाल होने वाली RK-39 स्ट्रिप जांच का पहला परीक्षण भी उन्होंने ही किया था। उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें पहले राष्ट्रपति द्वारा ‘विजिटर अवॉर्ड’ और ‘डॉ. पीएन राजू ओरेशन’ सम्मान भी मिल चुका है।
