आखिर क्यों भारत-नेपाल के बीच बार-बार उठता है कालापानी और लिपुलेख विवाद? PM बालेंद्र के बयान पर क्यों छिड़ा विवाद
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के सीमा विवाद पर दिए बयान के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। नेपाल ने भारत के साथ राजनयिक बातचीत से समाधान की बात दोहराई है। जानिए कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा विवाद की पूरी पृष्ठभूमि, नेपाल में क्यों मचा बवाल और भारत का क्या है रुख।
India Nepal Border Dispute: भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चल रहा सीमा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के संसद में दिए गए बयान के बाद नेपाल की राजनीति से लेकर सोशल मीडिया तक नया विवाद खड़ा हो गया है। हालांकि नेपाल सरकार ने साफ किया है कि वह भारत के साथ सीमा विवाद को बातचीत और राजनयिक माध्यमों से ही सुलझाने के पक्ष में है।
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने रविवार को आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि भारत और नेपाल दोनों देश इस मुद्दे को आपसी संवाद और स्थापित कूटनीतिक तरीकों से हल करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
नेपाल ने क्या कहा?
नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और नेपाल के बीच सदियों पुराना खुला बॉर्डर है और वर्तमान अंतरराष्ट्रीय सीमा 1816 की सुगौली संधि के आधार पर तय हुई थी।
मंत्रालय ने माना कि सुस्ता, लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी जैसे कुछ क्षेत्रों की मैपिंग अब भी पूरी तरह नहीं हो सकी है। इसके अलावा कई जगहों पर सीमा अतिक्रमण और दशगजा यानी नो-मैन लैंड से जुड़े विवाद भी मौजूद हैं।
नेपाल सरकार के मुताबिक दोनों देशों की संयुक्त तकनीकी समिति सीमा स्तंभों की मरम्मत, डेटा संग्रह और विवादित इलाकों के संयुक्त अध्ययन का काम कर रही है।
PM बालेंद्र शाह ने संसद में क्या कहा?
नेपाल की संसद में पूछे गए सवालों के जवाब में प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने कहा कि भारत और नेपाल ने सीमा विवाद को लेकर एक-दूसरे को कूटनीतिक नोट भेजे हैं।
उन्होंने कहा कि दोनों देश इतिहासकारों, सर्वे विशेषज्ञों और तकनीकी टीमों की मदद से बातचीत के जरिए समाधान निकालने पर सहमत हैं। प्रधानमंत्री शाह का सबसे चर्चित बयान वह रहा, जिसमें उन्होंने कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाल की जमीन पर कब्जा नहीं किया, बल्कि नेपाल ने भी कुछ जगहों पर भारतीय जमीन का इस्तेमाल किया है।
उन्होंने संसद में कहा, मुझे प्रधानमंत्री बनने के बाद ही इस बारे में जानकारी मिली। दोनों देशों को तथ्यों का अध्ययन कर दोस्त की तरह बैठकर इस मुद्दे को सुलझाना चाहिए।
नेपाल में ही क्यों मच गया विवाद?
प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के इस बयान के बाद नेपाल में ही उनके खिलाफ विरोध शुरू हो गया। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने उनके बयान को तथ्यहीन और भ्रामक बताया। वहीं नेपाल के पूर्व राजदूतों और सीमा विशेषज्ञों ने भी उनके दावे को खारिज कर दिया।
भारत में नेपाल के पूर्व राजदूत नीलांबर आचार्य ने कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच 97 प्रतिशत सीमा विवाद पहले ही सुलझाए जा चुके हैं।
पूर्व राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने भी प्रधानमंत्री शाह के बयान को गलत बताया और कहा कि ऐसा कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, जिसमें नेपाल द्वारा भारतीय जमीन पर कब्जे की बात दर्ज हो।
सीमा विशेषज्ञ और भूगोलवेत्ता बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने भी कहा कि नेपाल ने कभी भारतीय जमीन पर कब्जा नहीं किया। उन्होंने कहा कि सीमावर्ती इलाकों में पारंपरिक उपयोग को अवैध कब्जा नहीं माना जा सकता।
लिपुलेख पर भारत का क्या है रुख?
हाल ही में नेपाल ने लिपुलेख दर्रे से गुजरने वाले कैलाश मानसरोवर मार्ग पर आपत्ति जताई थी, जिसके बाद भारत ने नेपाल के दावों को खारिज कर दिया था।
भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का स्थापित मार्ग रहा है और दशकों से इसका इस्तेमाल हो रहा है। भारत का कहना है कि नेपाल के क्षेत्रीय दावे ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों के अनुरूप नहीं हैं।
क्या है कालापानी-लिपुलेख विवाद?
भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर कई वर्षों से विवाद चल रहा है। ये इलाके भारत, नेपाल और तिब्बत (चीन) के त्रिकोणीय क्षेत्र के पास स्थित हैं। भारत का दावा है कि ये क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा हैं, जबकि नेपाल इन्हें अपना क्षेत्र बताता है।
साल 2020 में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इन क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया था। भारत ने उस नक्शे को “एकतरफा और कृत्रिम विस्तार” बताते हुए खारिज कर दिया था।
बातचीत से समाधान पर जोर
नेपाल सरकार ने अपने ताजा बयान में साफ किया है कि वह सीमा विवाद को टकराव नहीं बल्कि बातचीत के जरिए हल करना चाहती है। दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि सीमा विवाद का समाधान भी आपसी संवाद और कूटनीतिक सहमति के जरिए ही निकलेगा।
