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साहित्य में एआई : क्या मौलिक साहित्य सृजन का नाभिश्वास चल रहा है?

 
 साहित्य में एआई : क्या मौलिक साहित्य सृजन का नाभिश्वास चल रहा है?
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2125 का वर्ष है। 22वीं सदी 25 वर्ष की हो चुकी है। ऑनलाइन की दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। 21वीं सदी के लोग मोबाइल में समय बिताते थे, यह बात नई सदी के लोगों को अजीब लगती है। 22वीं सदी की मॉडर्न पीढ़ी वीआर और एआई ग्लास को भी पुरानी चीज मानती है। 2040-2050 में जन्मी पुरानी पीढ़ी अभी भी ऐसे वीआर-एआई ग्लास का वजन उठाकर घूमती है। 2030 में जन्मे बहुत से लोग मोबाइल और लैपटॉप का कैसा जमाना था, ऐसी पुरानी बातें करते हुए वीडियो बनाते हैं, जिनका ट्रेंड बीच-बीच में आता रहता है, लेकिन उनकी व्यूअरशिप भी 60-70 वर्ष आयु वर्ग में ही ज्यादा होती है। इस आयु वर्ग के लोगों ने अपने माता-पिता से ऐसी बातें सुनी होती हैं, इसलिए वे उससे कुछ हद तक जुड़ाव महसूस कर सकते हैं।

युवा पीढ़ी में चिप इम्प्लांट का जबरदस्त ट्रेंड चल रहा है। वीआर-एआई ग्लास उन्हें बिलकुल पसंद नहीं हैं। ऐसी प्रोडक्ट बनाने वाली मेटा और गूगल जैसी कंपनियां अब दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों में गिनी नहीं जातीं। उस चिप से जुड़ी स्क्रीन सोचते ही सामने आ जाती है और सोचते ही गायब भी हो जाती है। एआई राइटिंग तो छोड़िए, अब एआई वीडियो मेकिंग का जमाना है। 7 से 10 सेकंड के अल्ट्रा-शॉर्ट वीडियो बनाने वाले एआई क्रिएटर्स के करोड़ों फॉलोअर्स हैं। युवाओं में से अनेक दूसरे ग्रहों पर जाने के लिए आवेदन कर चुके हैं। कुछ के लिए अंतरिक्ष यान में जाने से पहले जरूरी मेडिकल टेस्ट बाकी थे। मंगल सहित दो-तीन अन्य ग्रहों पर खनिज और अन्य परियोजनाएं चल रही थीं। अमेरिका-भारत-यूरोपीय संघ की स्पेस एजेंसियां विशेषज्ञ युवाओं को भारी वेतन पर दूसरे ग्रहों पर भेजती थीं। ऐसे युवा पृथ्वी पर लौटकर वहां के गुणगान करते थे, इसलिए नई पीढ़ी में दूसरे ग्रहों पर जाकर कमाने की जबरदस्त इच्छा थी।

ऐसे समय में पृथ्वी पर साहित्य का एक बड़ा उत्सव मनाया जा रहा था। स्वीडन का स्टॉकहोम कॉन्सर्ट हॉल, जो अब टेक्नोलॉजी सेंटर का जीवंत उदाहरण बन चुका था, वहां पूरे 23 वर्षों बाद मौलिक लेखन के लिए एक भारतीय साहित्यकार को साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया जाना था। मौलिक लेखन का सृजन लगभग बंद हो चुका था, इसलिए पिछले 23 वर्षों से नोबेल समिति को इस पुरस्कार के लिए कोई योग्य व्यक्ति नहीं मिला था। अब एक ऑनलाइन पुस्तक प्रकाशित हुई थी। एक से अधिक एआई डिटेक्टर्स ने उसे मौलिक लेखन घोषित किया, उसके बाद उस साहित्यकार ने पुरस्कार के लिए आवेदन किया और उसका आवेदन स्वीकार कर लिया गया।

एआई एंकर्स द्वारा लिए गए उसके इंटरव्यू युवा पीढ़ी में वायरल हो गए थे। केवल 48 पन्नों की पुस्तक कोई मनुष्य मौलिक रूप से लिख सकता है, यह बात नई पीढ़ी के लिए कौतूहल का विषय थी। भारतीय लेखक ने इस पुस्तक का पूरा श्रेय अपनी 2044 में जन्मी 81 वर्षीय दादी को देते हुए कहा कि उनकी दादी ने उन्हें भारतीय पौराणिक कथाएं सुनाई थीं, इसलिए बचपन से ही उन्हें मौलिक लेखन का आकर्षण था और उन्होंने बहुत छोटी उम्र से कुछ पंक्तियां लिखने की आदत विकसित कर ली थी।

2125 के इस वर्ष की यह मौलिक कल्पना अभी और आगे बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल यह केवल कल्पना है, लेकिन जिस गति से एआई तकनीक और एआई राइटिंग का धुआंधार ट्रेंड बढ़ रहा है, उसे देखते हुए यह कल्पना शायद 21वीं सदी के अंत में या 22वीं सदी में सच भी साबित हो सकती है। बड़े पैमाने पर एआई लेखन तेजी से ऑनलाइन डाला जा रहा है और यदि यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा तो पूरी एक पीढ़ी को मौलिक लेखन की जगह एआई की मदद लेने की आदत पड़ जाएगी। अभी से स्कूल-कालेज के प्रोजेक्ट से लेकर पीएचडी थीसिस तक हर स्तर पर एआई का उपयोग बढ़ा है और उसकी शिकायतें भी बढ़ी हैं।

2125 की पीढ़ी की बात तो दूर, आज की जेन-जी भी मौलिक लिखना नहीं चाहती, लिखने का अभ्यास नहीं करना चाहती। यह भाषा की बाधा का मामला नहीं है। मुद्दा यह है कि मौलिक सोच में एआई की घुसपैठ हो रही है। यदि नए रचनात्मक विचार आते रहें तो हम किसी भी भाषा में लिख सकते हैं, लेकिन यदि नए विचार ही आना बंद हो जाएं तो मौलिक लेखन की गंगोत्री सूख जाएगी।

मौलिक लेखन के सामने अभी, जब 21वीं सदी के 26 वर्ष पूरे हुए हैं, तब से ही गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं। एक रचनात्मक सोशल मीडिया कैप्शन लिखने के लिए भी लोग एआई की मदद लेने लगे हैं और अब बात एक कदम आगे बढ़कर साहित्यिक लेखन तक पहुंच गई है। साहित्यिक लेखन, जो मानव जाति की भावनाओं का विस्तार है, उसमें भी एआई टूल्स की घुसपैठ का एक गंभीर मामला सामने आया है।

यूके की एक प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका है- ग्रांटा। यह पत्रिका 1889 से प्रकाशित हो रही है। कॉमनवेल्थ फाउंडेशन हर वर्ष कॉमनवेल्थ देशों के साहित्यकारों को कॉमनवेल्थ प्राइज देता है और उनकी रचनाएं ग्रांटा में प्रकाशित होती हैं। 2026 का कॉमनवेल्थ प्राइज पाने वाले त्रिनिदाद के लेखक जमीर नाजिर पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी रचना एआई की मदद से लिखी है। ब्रिटिश प्रोफेसर ईथन मोलिक ने एआई डिटेक्टर टूल से जांच कर दावा किया कि रचना का सौ प्रतिशत कंटेंट एआई से जनरेट किया गया है। इस मुद्दे पर भारी विवाद हुआ।

इसके बाद दो अन्य विजेता रचनाकारों - माल्टा के जॉन एडवर्ड और भारतीय मूल के शेरोन अरूपारायिल की रचनाओं पर भी ऐसे ही आरोप लगे। द गार्डियन से लेकर द न्यू यॉर्कर, टाइम और वॉशिंगटन पोस्ट तक हर जगह इसकी चर्चा हुई। एआई टूल्स ने उनकी रचनाओं में एआई के उपयोग की संभावना बताई, जबकि लेखकों और कॉमनवेल्थ अवॉर्ड समिति ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। सभी लेखकों ने अलग-अलग तर्क देकर अपना बचाव किया। जमीर नाजिर ने कहा कि वे वर्षों से बीमार हैं और लिख नहीं पाते, इसलिए वे स्पीच-टू-टेक्स्ट टूल का सहारा लेते हैं। यह मानकर कि तकनीक उनकी मदद करेगी। लेकिन तकनीक ने मदद करने के बजाय पूरी रचना का श्रेय ही अपने नाम कर लिया।

इस घटना ने साहित्य में एआई लेखन के बढ़ते उपयोग पर बहस छेड़ दी है। रचनाकारों के पक्ष में एक तर्क यह है कि शोध के लिए एआई की मदद लेना गलत नहीं है। यदि विचार मौलिक हो तो एआई उसकी प्रस्तुति को बेहतर बना सकता है। दूसरी ओर विरोधियों का तर्क है कि यदि साहित्य ही एआई की सहायता से लिखा जाए तो उसमें मौलिकता कहां रह जाएगी? फिर वह एआई की रचना है, इसलिए पुरस्कार भी एआई टूल्स को ही मिलने चाहिए।

साहित्य में एआई टूल्स की मदद का मुद्दा भारत सहित कई देशों की अदालतों तक पहुंच चुका है। यदि किसी रचना का निर्माण एआई से होता है तो भविष्य में कॉपीराइट का प्रश्न भी गंभीर रूप से उठेगा। लेकिन ऐसे किसी बड़े कानूनी विवाद से पहले ही ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों पर कंटेंट राइटिंग के लिए एआई टूल्स का खुलेआम उपयोग हो रहा है।

हमें एक बात याद रखनी होगी कि एआई के पास अपना कुछ नया नहीं होता। वह केवल उसे दिए गए डेटा का विश्लेषण करके ही विचार प्रस्तुत करता है। जब कॉमनवेल्थ प्राइज पाने वाले लेखकों पर एआई के आरोप लगे, तब कई शोधकर्ताओं ने दावा किया कि कुछ वर्णन छह-सात दशक पुरानी रचनाओं से लिए गए हैं। संक्षेप में एआई ने कहीं से सामग्री उठाकर, साहित्यकारों को पता भी न चले, इस तरह मौलिक लेखन का भ्रम पैदा किया होगा।

खैर, जिस तेजी से लेखन और नए विचार प्राप्त करने में एआई टूल्स का उपयोग बढ़ रहा है, उसे देखते हुए मौलिक लेखन की धारा सूख जाने की आशंका है। कहीं ऐसा न हो कि 2125 के वर्ष की यह कल्पना समय से पहले ही सच साबित हो जाए!
हम ऑनलाइन जो पढ़ते हैं, उसमें कितना कंटेंट एआई लिखता है?

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने एआई टूल की सहायता से एक नमूना अध्ययन किया और पाया कि ऑनलाइन पोस्ट होने वाली लगभग आधी सामग्री एआई टूल्स द्वारा जनरेट की जाती है। नवंबर 2022 में एआई चैटबॉट चैटजीपीटी के लॉन्च होते ही एआई युग की शुरुआत हुई। चैटजीपीटी के बाद गूगल, मेटा जैसी अनेक कंपनियां एआई की प्रतिस्पर्धा में कूद पड़ीं। डेढ़-दो वर्षों के भीतर एक लाख एआई कंपनियां बन गईं और आज विश्व स्तर पर लगभग ढाई लाख कंपनियां एआई तकनीक उपलब्ध कराती हैं। इन कंपनियों के लगभग 10 हजार एआई टूल्स कंटेंट राइटिंग की सुविधा देते हैं। चैटजीपीटी, ग्रोक, जेमिनी, परप्लेक्सिटी, कॉपी.एआई, ग्रामरली, राइटसोनिक जैसे लोकप्रिय टूल्स के उपयोगकर्ता करोड़ों में हैं। इसके अलावा लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) आधारित अनेक टूल्स लगातार उपलब्ध हो रहे हैं।

शुरुआत में उपयोगकर्ता यह जानने के लिए एआई टूल्स का उपयोग करते थे कि वे काम कैसे करते हैं। जब लोगों को समझ में आया कि एआई कुछ ही क्षणों में कंटेंट तैयार कर सकता है, तब उसका व्यावसायिक उपयोग तेजी से बढ़ा। 2024 तक मानव-निर्मित लेखन का हिस्सा 61 प्रतिशत था और एआई जनरेटेड कंटेंट लगभग 39 प्रतिशत था। 2025 के अंत तक एआई लेखन मानव लेखन से आगे निकल चुका था। स्टैनफोर्ड रिसर्च के अनुसार सोशल मीडिया पर कुल लिखित सामग्री में 51.72 प्रतिशत हिस्सा एआई जनरेटेड है। अनुमान है कि 2026 के अंत तक एआई आधारित कंटेंट का हिस्सा 74 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। गूगल जिन वेबपेजों को टॉप रैंकिंग देता है, उनमें से 86.5 प्रतिशत वेबपेजों पर एआई कंटेंट का अनुपात 60 प्रतिशत से भी अधिक है। सोशल मीडिया पर एआई जनरेटेड कैप्शन और तस्वीरों की भरमार मौलिक कंटेंट को चिंताजनक रूप से पीछे धकेल रही है।