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अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर: स्वतंत्रता संग्राम की गाथा और आज का सशक्त भारत

 
अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर: स्वतंत्रता संग्राम की गाथा और आज का सशक्त भारत
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इतिहास के पन्नों से
"अमृत महोत्सव से अमृत काल
की ओर"

अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर: स्वतंत्रता संग्राम की गाथा और आज का सशक्त भारत

एक विराट देश की स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ, इससे बड़े गौरव और प्रसन्नता की बात क्या हो सकती है!
वह स्वतंत्रता जिसे पाने के लिए दुनिया के इतिहास का सबसे लंबा संग्राम लड़ा गया। लाखों लोगों ने प्राणों की आहुति दी जेल में यातनाएं सही प्राणों की आहुति दी। प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह स्वतंत्रता संग्राम को विस्तार से जाने। निश्चय ही स्वतंत्रता संग्राम को जानने समझने से हमें एक "राष्ट्रीय चरित्र" का निर्माण करने की प्रेरणा मिलेगी। बिना राष्ट्रीय चरित्र के किसी देश के लिए ना भौतिक उन्नति संभव है और ना ही बौद्धिक संस्कृति एवं आध्यात्मिक उन्नति। स्वतंत्रता संग्राम को सूत्र रूप में समझना हो तो कुछ धाराएं स्पष्ट रूप से सामने आती हैं। तिलका मांझी और बिरसा मुंडा जैसे जननायकों का विद्रोह है जो देश के अलग-अलग हिस्सों में विभिन्न रूपों में सामने आते हैं। वे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले अंग्रेजों के शोषण दमन और अत्याचारों को चुनौती देते हैं। फिर 1857 की जन क्रांति सामने आती है जो " सिपाही विद्रोह "से शुरू होती है और एक विशाल सशस्त्र विद्रोह में बदल जाती है।

अमृत महोत्सव से अमृत काल की ओर: स्वतंत्रता संग्राम की गाथा और आज का सशक्त भारत


बहादुर शाह जफर,रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहब पेशवा, कुंवर सिंह, तात्या टोपे के साथ बेगम हजरत महल जैसी महिलाओं का बलिदान भी जनमानस में क्या स्थाई रूप ले लेता है। 1857 के विद्रोह को ब्रिटिश सरकार बेहद निर्दयता से कुचल देती है। घर-घर से नौजवानों को पकड़ कर पेड़ों पर लटका दिया जाता है फिर गूंजता है 'स्वाधीनता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है'का उद्घोष । लोकमान्य तिलक स्वतंत्रता की चेतना जागते हैं। क्रांतिकारियों की वीरता पूर्ण विद्रोही गतिविधियों और उनकी फांसी भी देश प्रेम की मशाल जलाई रखती है फिर पूरा संसार दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के सत्याग्रह के चमत्कार से परिचित होता है जिसके शासन में सूर्य नहीं डूबता वही ब्रिटिश साम्राज्य अपने कानून बदलने को विवश हो जाता है। दक्षिण अफ्रीका में पशुओं से बत्तर जीवन जीने को विवश करोड़ भारतीयों तथा अश्वेत्तो
का जीवन एक में उजाले से भर जाता है।

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यह जनशक्ति, जन चेतना,जन विद्रोह के समक्ष एक शक्तिशाली साम्राज्य का घुटने टेक देना समूचे विश्व के लिए अकल्पनीय घटना थी।
महात्मा गांधी जब इतनी बड़ी सफलता के बाद भारत लौटते हैं तो पूरे देश का भ्रमण करते हैं भारत की गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास, छुआछूत जैसे अनेक गंभीर चुनौतियों को समझते हैं।
गांधी जी को चंपारण से ही एक उम्मीद की किरण मिल जाती है और वह स्वतंत्रता संग्राम के लिए 'अहिंसा सत्याग्रह तथा ब्रिटिश सरकार से सहयोग को अपनाकर करोड़ आम भारतीयों को स्वाधीनता सेनानी बना देते हैं।
पर्दे में रहने वाली महिलाएं भी सड़कों पर आ जाती हैं। सिर्फ प्रस्ताव पास करने वाली ब्रिटिश सरकार के लिए 'सेफ्टी वाल्व'बनी कांग्रेस भी आमूल चूल बदल जाती है और एक नया इतिहास बन जाता है।

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क्रांतिकारी धारा अपना प्रवाह जारी रखती है। चंद्रशेखरआजाद, भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी ब्रिटिश सरकार को भयग्रस्त बनाए रखते हैं तथा जन चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ब्रिटिश सरकार भगतसिंह को बेहद अनुचित ढंग से रात में फांसी लगा देती है और जिस समय न रेडियो था ना टेलीविजन ना सोशल मीडिया किंतु कुछ ही घंटे में लाखों लोग भगत सिंह की चिता के पास जमा हो जाते हैं।
फिर 'आजाद हिंद फौज' का गौरवशाली अध्याय जुड़ता है। 'भारत छोड़ो आंदोलन' में पहले ही देश भर में स्वाधीनता की तड़प अपने उत्कर्ष पर पहुंचा दी थी।
लाल किले में ब्रिटिश सरकार द्वारा मुकदमा चलाने पर आजाद हिंद फौज के तीन नायक 'सहगल', ढिल्लन, शाहनवाज-कहते हैं हां हमने बगावत की है हमें आजादी चाहिए! इसके बाद नौसेना का विद्रोह वहां ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोंक देता है।
धारा चाहे अलग-अलग थी किंतु लक्ष्य एक ही था। सभी धाराओं का अपना-अपना ऐतिहासिक महत्व है ,सभी धारा एक दूसरे की पूरक हैं ,सभी के बलिदानों का बराबर सम्मान होना चाहिए शहीदों के बलिदानों की गाथा हमारे आने वाली पीढियां के लिए प्रेरणा की स्रोत बननी चाहिए।

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जहां सुई नहीं बनती थी…..
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में जो प्रशन हासिल की है उन पर भी विचार करना आवश्यक है लेकिन उपलब्धियां पर विचार करते समय एक बार फिर हमें अतीत की ओर मुड़ना पड़ेगा।
अंग्रेज भारत को किस दुर्दशा में छोड़ गए थे। अंग्रेजों के द्वारा बोया गया विषवृक्ष देश के बंटवारे के रूप में सामने आया था। भयानक गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा, कुटीर उद्योग एवं लघु उद्योग का क्षरण। कक्षा 5 तक शिक्षा के लिए मिलों दूर, फिर आठवीं के लिए और दूर और स्नातक के लिए शहर। यह उन दिनों की बात है जब एक विश्वविद्यालय का पूरे प्रांत में होना एक बड़ी बात थी। स्वास्थ्य के लिए झाड़ फूंक ही मुख्य साधन हुआ करते थे। अस्पतालों में भी सीमित साधन हुआ करते थे।
ऐसे परिदृश्य में भारत के नवनिर्माण के लिए प्रयास हुआ।
भाखड़ा नांगल जैसे, आईआईटी, भारतीय विज्ञान संस्थान जैसी शिक्षक एवं शोध संस्थाएं, एम्स जैसे अस्पताल, बी.एच. ई .एल जैसे भारी उद्योग, रेडियो स्टेशनों की श्रृंखला, विश्वविद्यालय की स्थापना और धीरे-धीरे पूरे विश्व में अपनी नई छवि गढ़ानेवाला भारत बनने लगा।

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अमेरिका में डेढ़ सौ वर्ष बाद सबको मताधिकार मिला किंतु भारत जैसे विशाल राष्ट्र में प्रारंभ से ही सभी को समान मताधिकार मिले। महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर उच्चतम पदों को सुशोभित करने लगी।
भारतवंशी तथा प्रवासी भारतीय विश्व भर में अपनी धाक जम रहे हैं। खेलों में भी निरंतर सफलता मिल रही है क्रिकेट में तो हम शीर्ष पर हैं। भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में शामिल है। मंगल मिशन हो या एक साथ 106 उपग्रह का प्रक्षेपण हम विज्ञान प्रौद्योगिकी की दुनिया में शीर्ष देश में है। कंप्यूटर के क्षेत्र में भारत एक महाशक्ति बन चुका है, ड्रोन तथा कृत्रिम बुद्धि का क्षेत्र हो अथवा गैर पारंपरिक ऊर्जा का क्षेत्र भारत सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहा है। भारत में ऐसी अनेक उपलब्धियां हासिल की है जिसे पूरे विश्व में भारत का मान सम्मान बढ़ा है।
स्वाधीनता की इस वर्षगांठ के पावन अवसर पर बनारस ग्लोबल टाइम्स के पाठको एवं देशवासियों को शुभकामनाएं।
भारत की स्वतंत्रता अमर रहे, लोकतंत्र अमर रहे, भारतीय संस्कृति अमर रहे।

कृत -अमित श्रीवास्तव

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