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BRICS में भारत का बड़ा बैलेंसिंग एक्ट, ट्रंप फैक्टर से ईरान-सऊदी तनाव तक PM मोदी के सामने कौन-कौन सी चुनौती

भारत की अध्यक्षता में हो रहा BRICS Summit 2026 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए बड़ी कूटनीतिक परीक्षा है। अमेरिका से रणनीतिक रिश्तों के बीच रूस और चीन के साथ संतुलन, वहीं ईरान, सऊदी अरब और UAE के तनाव को साधना चुनौती है। सबसे बड़ा सवाल है कि भारत कैसे सर्वसम्मति बनाएगा।
 
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BRICS Summit 2026: भारत की अध्यक्षता में हो रहा BRICS Summit 2026 सिर्फ दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्थाओं की बैठक नहीं है। इस बार यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक क्षमता की भी बड़ी परीक्षा है। एक तरफ भारत के अमेरिका के साथ लगातार मजबूत होते रणनीतिक रिश्ते हैं, तो दूसरी तरफ रूस और चीन हैं, जो मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व वाली वैश्विक व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं। इनके बीच ईरान, सऊदी अरब और UAE का टकराव इस पूरे समीकरण को और पेचीदा बना रहा है।

भारत 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में 18वें BRICS Summit की मेजबानी कर रहा है। दो दिन चलने वाले इस सम्मेलन में 11 BRICS देशों के नेता शामिल हो रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भी सात साल बाद भारत पहुंचे हैं, जबकि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी सम्मेलन में मौजूद हैं। खास बात यह है कि इस बार ऐसे देश भी एक ही मंच पर हैं, जो सीधे तौर पर एक-दूसरे के विरोधी खेमों में खड़े हैं।

G20 के बाद अब BRICS में और कठिन परीक्षा

साल 2023 में भारत ने G20 Summit के दौरान उस समय बड़ी कूटनीतिक सफलता हासिल की थी, जब यूक्रेन युद्ध के बीच रूस और पश्चिमी देशों को एक साझा घोषणा पर सहमत कराया गया था। उस घोषणा में रूस की सीधे तौर पर निंदा नहीं की गई, लेकिन सभी देशों की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता के सम्मान की बात कही गई थी।

BRICS में इस बार चुनौती अलग और ज्यादा जटिल है। इसकी वजह सिर्फ रूस और पश्चिम के बीच तनाव नहीं, बल्कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध भी है।

इस संघर्ष का असर खाड़ी क्षेत्र पर पड़ा है। ईरान के हमलों का सामना UAE और सऊदी अरब को भी करना पड़ा है। ऐसे में BRICS की बैठक में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, UAE के क्राउन प्रिंस और सऊदी अरब के विदेश मंत्री का एक ही मंच पर होना भारत के लिए आसान स्थिति नहीं है।

ईरान कुछ और चाहता है, सऊदी-UAE का रुख अलग

ईरान की कोशिश हो सकती है कि BRICS अमेरिका की सैन्य कार्रवाई के खिलाफ कड़ा रुख अपनाए। दूसरी ओर सऊदी अरब और UAE ईरान के खाड़ी क्षेत्र में किए गए हमलों की निंदा की मांग कर सकते हैं। यहीं भारत की असली चुनौती सामने आती है।

भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते हैं, लेकिन साथ ही सऊदी अरब और UAE के साथ भी उसके बेहद महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर निवेश और क्षेत्रीय सहयोग तक, तीनों देश भारत के लिए अहम हैं। यानी नई दिल्ली के लिए किसी एक पक्ष के साथ खड़ा दिखना अपने हितों के खिलाफ जा सकता है।

इस मुश्किल का संकेत मई में ही मिल गया था। BRICS विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त बयान जारी किए बिना खत्म हो गई थी। इसकी बड़ी वजह ईरान और UAE के बीच मध्य पूर्व के हालात को लेकर मतभेद बताए गए थे।

अब भारत रूस और मिस्र के साथ बैक-चैनल बातचीत के जरिए ईरान, सऊदी अरब और UAE के बीच मतभेद कम करने की कोशिश कर रहा है, ताकि BRICS की संयुक्त घोषणा पर सहमति बनाई जा सके।

'बिश्केक डिक्लेरेशन' की छाया भी रहेगी

भारत की मुश्किल सिर्फ BRICS के अंदर मौजूद मतभेदों तक सीमित नहीं है। करीब दो सप्ताह पहले SCO Summit में भारत ने बिश्केक घोषणा पर हस्ताक्षर किए थे। इसमें ईरान पर हुए हमलों की निंदा की गई थी और उसके शांतिपूर्ण परमाणु कार्यक्रम के अधिकार का समर्थन किया गया था।

यह भारत के लिए महत्वपूर्ण बदलाव था, क्योंकि फरवरी में युद्ध शुरू होने के बाद नई दिल्ली ने इस मुद्दे पर काफी संयमित रुख अपनाया था। अब BRICS की अध्यक्षता करते हुए भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी भूमिका किसी एक गुट के समर्थन के तौर पर न देखी जाए।

पूर्व G20 शेरपा अमिताभ कांत ने भी कहा है कि भारत को BRICS अध्यक्ष के तौर पर एक परिपक्व और अनुभवी भूमिका निभानी होगी। उनके मुताबिक भारत को अमेरिका, यूरोप और चीन के साथ एक साथ काम करना जरूरी है।

सबसे बड़ा 'इनविजिबल फैक्टर' हैं डोनाल्ड ट्रंप

BRICS Summit में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मौजूद नहीं हैं, लेकिन इसके बावजूद उनका प्रभाव सम्मेलन पर साफ दिखाई दे रहा है।

ट्रंप लंबे समय से BRICS को अमेरिकी आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए चुनौती के तौर पर देखते रहे हैं। पिछले साल उन्होंने BRICS देशों को डॉलर का विकल्प तलाशने पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी तक दी थी। बाद में उन्होंने उन देशों पर भी अतिरिक्त टैरिफ की चेतावनी दी थी, जो उनके मुताबिक BRICS की 'अमेरिका विरोधी नीतियों' के साथ जाएंगे।

भारत पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि BRICS का उद्देश्य अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कोई अलग मुद्रा बनाना नहीं है। इसके बजाय समूह के भीतर द्विपक्षीय व्यापार को स्थानीय मुद्राओं में निपटाने की संभावनाओं पर जोर दिया गया है।

भारत के लिए यह स्पष्टीकरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ा रहा है और दूसरी तरफ रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंधों को भी बनाए हुए है।

BRICS को एंटी-वेस्ट मंच बनने से रोकना भी चुनौती

BRICS को लेकर भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि यह किसी 'एंटी-वेस्ट' गठबंधन के रूप में नहीं, बल्कि ग्लोबल साउथ की आवाज के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है। लेकिन मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां इस दावे को चुनौती दे रही हैं।

रूस पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। चीन अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव में है और ईरान लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच है। अब अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य संघर्ष भी चल रहा है।

ऐसे में BRICS का कोई भी फैसला आसानी से भू-राजनीतिक संदेश में बदल सकता है।

भारत की कोशिश यही होगी कि BRICS को अमेरिका विरोधी मंच की छवि से बचाया जाए और साथ ही रूस, चीन तथा अन्य सदस्य देशों के साथ अपने संबंधों को भी कमजोर न होने दिया जाए। अमेरिकी अर्थशास्त्री जेफ्री सैक्स ने भी भारत से जुड़े इस रुख को रेखांकित करते हुए कहा कि BRICS को 'एंटी-वेस्ट' के बजाय 'एंटी-इंपीरियलिज्म' के रूप में अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए।

क्या संयुक्त घोषणा पर बन पाएगी सहमति?

असल परीक्षा अब यही है कि क्या भारत सभी मतभेदों के बावजूद BRICS की संयुक्त घोषणा पर सहमति बना पाएगा। भारत की विदेश नीति लंबे समय से अलग-अलग शक्ति केंद्रों के साथ संबंध बनाए रखने और किसी एक खेमे का हिस्सा न बनने पर आधारित रही है। BRICS Summit में यही नीति सबसे कठिन दौर से गुजर रही है।

एक तरफ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी है। दूसरी तरफ रूस और चीन हैं। वहीं ईरान-अमेरिका संघर्ष ने सऊदी अरब और UAE को भी सीधे इस कूटनीतिक समीकरण में ला खड़ा किया है।

पूर्व राजदूत अनिल त्रिगुणायत के मुताबिक भारत पहले भी G20 और BRICS की अध्यक्षता के दौरान ऐसी चुनौतियों से निपट चुका है और उसके पास सभी पक्षों के लिए स्वीकार्य घोषणा तैयार करने की कूटनीतिक क्षमता है। उन्होंने यह भी बताया कि BRICS की बाकी 22 मंत्रिस्तरीय बैठकों और करीब 100 कार्य समूहों में पहले ही सहमति बन चुकी है। इस BRICS Summit में भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि किसी एक देश के पक्ष में खड़ा होना नहीं, बल्कि सभी विरोधी हितों के बीच सहमति बनाए रखना होगी।

नई दिल्ली को अमेरिका को नाराज किए बिना रूस और चीन के साथ रिश्ते संभालने हैं, ईरान के साथ अपने संबंध बनाए रखते हुए सऊदी अरब और UAE की चिंताओं को भी समझना है। यही वजह है कि इस बार BRICS की अध्यक्षता भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय आयोजन नहीं, बल्कि उसकी 'बैलेंसिंग डिप्लोमेसी' का सबसे बड़ा टेस्ट बन गई है।