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बंगाल से महाराष्ट्र तक दोबारा चुनाव कराने की मांग, क्या पूरे राज्य का चुनाव रद्द कर सकता है कोर्ट? जानिए संविधान और कानून क्या कहते हैं

रामलीला मैदान की रैली में राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों पर सवाल उठाए। विपक्ष ने दोबारा चुनाव कराने की मांग की है। जानिए संविधान के अनुच्छेद 329(b) और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धाराएं 80, 81 और 100 चुनाव रद्द कराने के बारे में क्या कहती हैं।

 
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नई दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्ष की रैली के दौरान 2024 के लोकसभा चुनाव और पिछले दो वर्षों में हुए कई राज्यों के विधानसभा चुनावों पर सवाल उठाए गए। कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनाव प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप लगाते हुए कुछ राज्यों में चुनाव रद्द कर दोबारा मतदान कराने की मांग की। विपक्ष की मांग पश्चिम बंगाल, बिहार, दिल्ली, मध्य प्रदेश, हरियाणा, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के चुनावों को लेकर है। इसके साथ ही विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी उठाई है।

विपक्ष इससे पहले भी चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा चुका है। हाल ही में विपक्षी नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन सौंपकर पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों को रद्द करने की मांग की थी। अब सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दलों की मांग पर किसी राज्य का पूरा चुनाव रद्द किया जा सकता है? संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में चुनाव को चुनौती देने के लिए क्या व्यवस्था है? आइए समझते हैं।

चुनाव रद्द कराने को लेकर कानून क्या कहता है?

भारत में चुनाव की निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में प्रावधान किए गए हैं। चुनाव में धांधली, फर्जी मतदान, बूथ कैप्चरिंग या मतगणना में गंभीर अनियमितता होने पर कानूनी तरीके से चुनाव को चुनौती दी जा सकती है।

हालांकि, किसी राजनीतिक दल या उम्मीदवार की शिकायत मात्र से पूरी चुनाव प्रक्रिया रद्द नहीं हो जाती। इसके लिए कानून में तय प्रक्रिया का पालन करना और संबंधित अनियमितताओं के आधार प्रस्तुत करना जरूरी है।

संविधान का अनुच्छेद 329(B): चुनाव को चुनौती देने की प्रक्रिया

संविधान के अनुच्छेद 329(b) के अनुसार, संसद या राज्य विधानमंडल के चुनाव को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका का रास्ता अपनाना होता है। ऐसी याचिका उसी प्राधिकारी के सामने और उसी प्रक्रिया के तहत दाखिल की जा सकती है, जिसका प्रावधान संबंधित कानून में किया गया है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को अनावश्यक कानूनी बाधाओं से बचाना है, ताकि मतदान और चुनावी प्रक्रिया के दौरान लगातार मुकदमेबाजी के कारण चुनाव प्रभावित न हो।

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 80: चुनाव याचिका जरूरी

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 80 के तहत किसी चुनाव को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दाखिल करना जरूरी है। यानी यदि किसी उम्मीदवार या मतदाता को लगता है कि चुनाव में कानून का उल्लंघन हुआ है या परिणाम को प्रभावित करने वाली अनियमितता हुई है, तो वह निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत इसे चुनौती दे सकता है।

सिर्फ आरोप लगाना पर्याप्त नहीं होता। याचिका में यह बताना पड़ता है कि चुनाव में किस तरह की अनियमितता हुई और चुनाव को अमान्य घोषित करने की मांग किस कानूनी आधार पर की जा रही है।

धारा 81: कौन दाखिल कर सकता है चुनाव याचिका?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 81 चुनाव याचिका दाखिल करने के अधिकार और उसकी समयसीमा से जुड़ी है। इसके तहत चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार या उस निर्वाचन क्षेत्र का निर्वाचक यानी मतदाता चुनाव याचिका दाखिल कर सकता है।

इसका मतलब है कि चुनाव को चुनौती देने के लिए कानून में तय पात्रता और समयसीमा का पालन करना जरूरी है।

धारा 100: किन परिस्थितियों में चुनाव रद्द हो सकता है?

जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 100 में उन परिस्थितियों का उल्लेख है, जिनमें हाईकोर्ट किसी उम्मीदवार के निर्वाचन को अमान्य घोषित कर सकता है। इसके लिए चुनाव में कानून के तहत निर्धारित आधारों पर अनियमितता साबित होना जरूरी है।

इसलिए किसी चुनाव को रद्द कराने के लिए यह दिखाना होगा कि संबंधित मामले में धारा 100 के तहत लागू होने वाला कानूनी आधार मौजूद है। केवल चुनाव प्रक्रिया पर सामान्य आरोप लगाकर परिणाम निरस्त नहीं कराया जा सकता।

क्या पूरे राज्य में दोबारा चुनाव कराया जा सकता है?

विपक्ष की ओर से कई राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की मांग उठाई गई है, लेकिन ऐसी मांग अपने आप में चुनाव रद्द कराने का कानूनी आधार नहीं बनती। चुनाव में गड़बड़ी की शिकायतों पर कानून के तहत कार्रवाई होती है।

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को चुनावों के संचालन और निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी बूथ या क्षेत्र में निर्धारित परिस्थितियों में दोबारा मतदान कराया जा सकता है। वहीं, घोषित चुनाव परिणाम को चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका का रास्ता उपलब्ध है।

इसलिए पूरे राज्य या कई राज्यों के चुनाव रद्द कराने के लिए सक्षम प्राधिकारी या अदालत के सामने कानूनी आधार स्थापित करना जरूरी होगा।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक हर विधानसभा सीट का चुनाव अलग

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, विधानसभा चुनाव को एक ही इकाई मानकर चुनौती नहीं दी जा सकती। प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र का चुनाव अलग होता है। ऐसे में किसी सीट पर चुनाव रद्द कराने या दोबारा मतदान की मांग के लिए उसी निर्वाचन क्षेत्र से जुड़ी गड़बड़ी और उसके कानूनी आधार को सामने रखना होगा।

इसका अर्थ है कि केवल सामूहिक राजनीतिक आरोपों के आधार पर किसी राज्य या कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे रद्द नहीं किए जा सकते। चुनाव को चुनौती देने के लिए संबंधित सीट और मामले के तथ्यों के आधार पर कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी।

विपक्ष की मांग और चुनाव रद्द कराने की कानूनी प्रक्रिया में अंतर

विपक्ष ने चुनाव आयोग, SIR, EVM और मतदाता सूची से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए कई राज्यों में दोबारा चुनाव कराने की मांग की है। हालांकि, चुनाव रद्द करने का फैसला राजनीतिक मांग के आधार पर नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया और उपलब्ध आधारों के अनुसार होता है।

इसलिए किसी राज्य का पूरा चुनाव रद्द होगा या नहीं, यह संबंधित शिकायतों, उनके प्रमाणों और सक्षम अदालत या चुनाव प्राधिकरण के फैसले पर निर्भर करेगा।