CEC Gyanesh Kumar पर फिर महाभियोग की तैयारी, जाने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए कितने सांसदों की जरूरत, क्या है पूरी प्रक्रिया?
CEC Gyanesh Kumar Removal: चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों और दो चुनाव आयुक्तों की ओर से कई फैसलों पर दर्ज कराई गई लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक विवाद फिर तेज हो गया है। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार चुनाव आयोग के फैसलों और प्रक्रियाओं पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। इन आपत्तियों में नए मतदाताओं को जोड़ने, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनावी डेटा व सॉफ्टवेयर के प्रबंधन जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
इसी बीच विपक्षी दलों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए फिर से प्रस्ताव लाने की तैयारी की खबरें सामने आई हैं। इंडिया टीवी की 24 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक विपक्ष इस संबंध में प्रस्ताव का मसौदा तैयार कर रहा है और जल्द दोनों सदनों में नोटिस दिए जाने की संभावना है।
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि 14 आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने का मतलब अपने आप किसी तरह का कदाचार साबित होना नहीं है। चुनाव आयोग की ओर से इन घटनाक्रमों पर यह कहा गया है कि उसके फैसले आंतरिक जांच और संतुलन के बाद सर्वसम्मति से लिए गए।
ऐसे में सवाल है कि आखिर भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है और इसमें संसद की क्या भूमिका होती है?
क्या है पूरा विवाद?
द इंडियन एक्सप्रेस की जांच के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 बार कुछ फैसलों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। रिपोर्ट में बताया गया है कि इन आपत्तियों का संबंध मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने और हटाने, अपीलों तथा चुनावी डेटा वाले सॉफ्टवेयर तक पहुंच जैसे मुद्दों से था।
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठाए और मतदाता डेटा के केंद्रीकृत प्रबंधन को लेकर भी चिंता जताई। हालांकि, इसी अवधि में चुनाव आयोग ने सार्वजनिक तौर पर संयुक्त ब्रीफिंग भी कीं और आयोग की ओर से निर्णयों को सर्वसम्मत बताया गया।
मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कैसे होती है?
भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसकी जिम्मेदारी चुनावों का संचालन और मतदाता सूची से जुड़े कामों की निगरानी करना है।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। 2023 के कानून के तहत इसके लिए एक चयन समिति की व्यवस्था है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल अधिकतम छह साल या 65 वर्ष की आयु तक होता है, जो पहले हो।
CEC को कैसे हटाया जा सकता है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया आम चुनाव आयुक्तों से अलग और ज्यादा कठिन है। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत CEC को उसी तरीके और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।
2023 के कानून की धारा 11(2) भी यही व्यवस्था दोहराती है। इसके मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज के समान तरीके और आधार पर ही हटाया जा सकता है। वहीं अन्य चुनाव आयुक्तों को हटाने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश जरूरी होती है।
सुप्रीम कोर्ट के जज के मामले में हटाने का आधार सिद्ध कदाचार या अक्षमता होता है। इसलिए केवल राजनीतिक आरोप या किसी फैसले पर मतभेद अपने आप पद से हटाने का आधार नहीं बन जाते।
महाभियोग प्रस्ताव की शुरुआत कैसे होती है?
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया में संसद के सदस्य महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चूंकि CEC के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज जैसी हटाने की व्यवस्था लागू है, इसलिए Judges (Inquiry) Act, 1968 की प्रक्रिया लागू होती है।
प्रस्ताव लाने के लिए:
लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं।
नोटिस क्रमशः लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति को दिया जाता है।
अध्यक्ष या सभापति के पास प्रस्ताव को स्वीकार या खारिज करने का अधिकार होता है।
प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद क्या होता है?
अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की जाती है। इसमें एक सुप्रीम कोर्ट के जज, एक हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित कानून विशेषज्ञ शामिल होते हैं।
समिति आरोपों की जांच करती है और अपनी रिपोर्ट देती है। अगर कदाचार या अक्षमता साबित नहीं होती, तो प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ती। अगर आरोप साबित होते हैं, तो संसद में हटाने का प्रस्ताव आगे बढ़ सकता है।
संसद में कितने बहुमत की जरूरत होती है?
दोनों सदनों में हटाने का प्रस्ताव विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी है। इसके लिए सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई समर्थन चाहिए। दोनों सदनों से प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति के समक्ष हटाने का संबोधन भेजा जाता है।
इसलिए किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया केवल विपक्ष के प्रस्ताव या संसद में नोटिस देने से पूरी नहीं हो जाती। इसमें नोटिस की स्वीकार्यता, जांच, आरोपों का साबित होना और दोनों सदनों में विशेष बहुमत समेत कई संवैधानिक चरण शामिल हैं।
अप्रैल में भी आया था CEC को हटाने का प्रस्ताव
ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए विपक्ष पहले भी 12 मार्च 2026 को लोकसभा और राज्यसभा में नोटिस दे चुका है। लोकसभा वाले नोटिस पर 130 और राज्यसभा वाले नोटिस पर 63 सांसदों के हस्ताक्षर थे। दोनों नोटिस को अप्रैल में लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने स्वीकार नहीं किया।
अब सितंबर 2026 में ECI के भीतर दो चुनाव आयुक्तों की कथित 14 लिखित आपत्तियों की रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है। हालांकि, नई प्रक्रिया वास्तव में किस रूप में और कब शुरू होती है, यह विपक्ष की ओर से औपचारिक नोटिस दिए जाने और संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी के फैसले के बाद ही स्पष्ट होगा।
