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जिम्मेदारी का पलायन और टूटी बेड़ियां
 

 
 जिम्मेदारी का पलायन और टूटी बेड़ियां
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भारतीय समाज में आज जब हम महिलाओं को हर क्षेत्र में परचम लहराते देखते हैं, तो हम इसे 'प्रगति' का नाम देते हैं। लेकिन इस प्रगति के पीछे छिपे उन आंसुओं, संघर्षों और मजबूरियों की कहानी कोई नहीं पढ़ता, जिन्होंने एक घरेलू स्त्री को सड़क, खेत और दफ्तर तक खींच लिया। क्या कभी किसी ने गहराई से सोचा है कि जिसे हम 'सशक्तिकरण' कह रहे हैं, क्या वह वाकई एक चुनाव था या फिर एक हारी हुई व्यवस्था का अंतिम विकल्प?

​सच्चाई यह है कि जब-जब घर के पुरुष ने अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ा, तब-तब उस घर की नींव को गिरने से बचाने के लिए नारी को अपने कोमल हाथों में कुदाल, कलम और अधिकार की मशाल थामनी पड़ी।

​जब रक्षक ही विमुख हुआ: जिम्मेदारी का हस्तांतरण

​इतिहास गवाह है कि भारतीय समाज में 'अर्धनारीश्वर' की कल्पना थी, जहाँ पुरुष और स्त्री एक-दूसरे के पूरक थे। लेकिन धीरे-धीरे पुरुष प्रधान समाज ने 'अधिकार' तो अपने पास रखे, पर 'जिम्मेदारियों' से किनारा करना शुरू कर दिया।

​कल्पना कीजिए उस घर की, जहाँ सुबह निकलते समय 'रामू के पापा' को दूध लाने की जिम्मेदारी दी गई थी। लेकिन शाम ढलते ही जब वे नशे में लड़खड़ाते हुए या ताश की गड्डी थामे खाली हाथ घर लौटते हैं, तो उस पल एक मां का दिल टूटता नहीं है, बल्कि वह कठोर हो जाता है। अगले दिन वह खुद दूध लेने निकलती है। यह उसका 'शौक' नहीं था, यह उसके बच्चे की भूख का सवाल था। यहीं से शुरू होती है वह यात्रा, जिसे आज हम 'महिलाओं का बढ़ता दखल' कहते हैं।​

खेतों की मेड़ से दफ्तर की मेज तक: मजबूरी का नाम सशक्तिकरण

​गाँव की चौपालों पर आज भी राजनीति और ताश के पत्तों के बीच पुरुष अपनी ऊर्जा व्यर्थ कर रहे हैं, जबकि लहलाती फसलों की कटाई और सिंचाई की चिंता 'रामदीन की मां' के कंधों पर है। छोटे बच्चे को पीठ पर लादकर खेत में पसीना बहाती वह महिला किसी 'करियर' की तलाश में नहीं है, बल्कि वह उस पेट की आग को बुझाने की जद्दोजहद में है जिसे उसके पति ने नजरअंदाज कर दिया।

​शहरों में भी यही कहानी है। जब घर का खर्च चलाने वाला पुरुष अपनी कमाई जुए, शराब या लापरवाही में उड़ाने लगा, तो मध्यमवर्गीय महिला को मजबूरी में घर की दहलीज लांघनी पड़ी। आज वह दोहरी मार झेल रही है। सुबह का नाश्ता और बच्चों का टिफिन तैयार करना और फिर दिन भर बाहर की दुनिया से जूझना।

आरक्षण: अधिकार या समाज की विफलता का प्रायश्चित?

​अक्सर यह बहस छिड़ती है कि महिलाओं को आरक्षण की क्या आवश्यकता है? यदि पुरुष समाज ने अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाया होता, यदि हर स्त्री अपने घर में सुरक्षित, सम्मानित और आर्थिक रूप से निश्चिंत होती, तो शायद उसे 'आरक्षण' की बैसाखी की जरूरत ही न पड़ती।

​सरकारों ने भी अपनी 'फूट डालो और राज करो' की नीति के तहत महिलाओं को केवल वोट बैंक समझा। उन्हें अधिकार तो दिए, लेकिन समाज की मानसिकता नहीं बदली। आज भी ग्राम पंचायतों में महिला सरपंच केवल एक 'मुहर' (Rubber Stamp) है। असली सत्ता 'सरपंच पति' चलाते हैं। और विडंबना देखिए, यदि वही महिला अपने अधिकारों का प्रयोग कर कोई स्वतंत्र निर्णय ले ले, तो यह पुरुष प्रधान समाज उसे 'चरित्रहीन' घोषित करने में एक पल की देरी नहीं करता।

न्याय की गुहार और टूटते घर

​एक बेटी के माता-पिता का सपना होता है कि उनकी लाडली एक सुयोग्य वर के साथ सुखी संसार बसाए। वह घर के हर छोटे-बड़े काम को खुशी-खुशी अपनी जिम्मेदारी मानकर करना चाहती है। लेकिन जब वही 'सुयोग्य' वर अपनी मर्यादाएं भूल जाता है और जिम्मेदारी निभाने के बजाय प्रताड़ना का रास्ता चुनता है, तब उस महिला के पास दो ही विकल्प बचते हैं।या तो वह फांसी का फंदा चूम ले, या फिर कोर्ट और महिला हेल्प लाइन का दरवाजा खटखटाए। ​जब वह अपने हक के लिए बाहर निकलती है, तो समाज उसे 'मर्यादा लांघने वाली' कहता है। कोई यह नहीं पूछता कि उसे इस मोड़ पर खड़ा किसने किया?

महंगाई और दोहरी मार का बोझ

​आज के दौर में महंगाई चरम पर है। सत्ता संभालने वाले बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन छोटे-छोटे घरों का बजट बिगड़ चुका है। पुरुष प्रधान समाज में अगर पुरुष अपनी आय और व्यय के प्रति ईमानदार होता, तो शायद महंगाई का असर इतना विकराल न होता। आज एक महिला पर न केवल घर संभालने का दबाव है, बल्कि घर खर्च के लिए पैसे जुटाने की 'दोहरी मार' भी है। वह सुबह से रात तक मशीन की तरह चलती है, ताकि उसका परिवार सुरक्षित रहे।

​समाधान क्या है?

​नारी सशक्तिकरण की असली चाबी संसद के बिलों में नहीं, बल्कि पुरुष की ईमानदारी में छिपी है। यदि पुरुष अपनी जिम्मेदारियों के प्रति वफादार हो जाए, यदि वह अपने परिवार के प्रति अपनी भूमिका को समर्पण के साथ निभाए, तो किसी भी महिला को 'आरक्षण' की आवश्यकता महसूस नहीं होगी।

​नारी शारीरिक रूप से पुरुष से भिन्न हो सकती है, लेकिन मानसिक रूप से वह हमेशा से ही प्रबल रही है। उसकी मजबूरी को उसकी 'दखलंदाजी' समझना पुरुष समाज की सबसे बड़ी भूल है। आज जो बदलाव हम देख रहे हैं, वह दरअसल पुरुषों द्वारा छोड़ी गई रिक्तियों को भरने का महिलाओं का एक साहसिक प्रयास है। जिस दिन घर का पुरुष 'रामू के पापा' बनकर जिम्मेदारी से दूध का पैकेट और बच्चों का भविष्य घर लेकर आएगा, उस दिन शायद 'रामू की मां' को धूप में झुलसने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन जब तक जिम्मेदारी का यह पलड़ा खाली रहेगा, नारी को शक्ति का रूप धरकर दहलीज लांघनी ही होगी।