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मुझे छोड़कर मेरी बातें...

 
मुझे छोड़कर मेरी बातें…
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मुझे छोड़कर मेरी बातें

सबसे तुमने जानी थी

क्या-क्या बीता अब तक मुझ पर

कुछ भी न तुम जान सके

पलको के नीचे जो मोती

क्या तुम उसे पहचान सके ?

मुझे छोड़कर..........

 

मन में बैठी पीडाओ को

क्या थोडा सा भी माप सके ?

प्यारी सी उस; तरूणी को

क्या कभी पहचान सके।

उठती-गिरती धड़कनो की

पतवारो को क्या तुम चाप सके

मुझे छोड़कर.........

 

मुझको ही न मालूम जो कुछ

वो सब कुछ तुमने जानी थी

एक बार जो मुझसे पूछा होता,

हृदय-कपाट खुल जाते सब

शिव-जटा सी बहती गंगा

कर जाती भावों को समतल

कहनी थी न जो-जो बातें

वो भी; तुमने कह डाली

मुझे छोड़कर..........

छोड़ो हटो, हटाओ बातें

कहने में क्या रक्खा है

जैसी तुम्हारी दृष्टि रही थी

वैसा ही सब जानी थी

सवेंगों के फूलो के सब बंधन

टूट-टूट कर विखर गये

पर; मुझे छोड़कर मेरी बाते

क्यूँ सबसे तुमने जानी थी।

       लेखिका- डॉ. लता कादम्बरी गोयल