तमाशा
Jun 4, 2026, 18:09 IST
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कौन कहता है ?
जीवन से कठपुतलियाँ चली गई
आज भी कई कठपुतलियाँ हैं
जिनकी एक डोर ईश्वर की ओर,
और दूसरी किसी और के हाथ में है।
कभी वह खिलौना थी पर
आज मदारी का बंदर बनी हुई है
या आप उसे 'नट का तमाशा' भी कह सकते हैं
दोनों छोरों को संतुलित करती
बड़ी मुश्किल से खुद को संतुलित कर पा रही है।
फिर भी, तमाशा तो तमाशा है! तमाशा तो तमाशा है!
कभी संसार मंच पर द्रौपदी के समान मोहरा
बन जाती है, और कभी, दुल्हन की तरह सजाई वो जाती है,
या फिर; कभी दहेज कि वेदी पर फेंक दी जाती है,
या कभी, सास-बहू बन जीवन में संतुलन ही बिठालती रह जाती है।
या फिर; कभी कुकर्मों का शिकार हो; भरी सड़क बरबाद हो जाती है।
और कभी; माँ की कोख में ही कराहकर कह उठती है।
"नही करना तमाशा मुझे
नहीं आना बाहर, तुम्हारा तमाशा क्या कम है ?
जो एक तमाशा और बनूँ।"
