युद्ध लड़ना और अधूरा छोड़ देना अमेरिका की फितरत रही है!
चाहे ईरान में सत्ता परिवर्तन कराना हो, धार्मिक विचारधारा बदलनी हो, ईरान के यूरेनियम पर नियंत्रण स्थापित करना हो, उसकी मिसाइल सिटी को नष्ट करना हो, गृहयुद्ध भड़काना हो अथवा होर्मुज जलडमरूमध्य खुलवाना हो, इस बार अमेरिका को इनमें से किसी भी लक्ष्य में सफलता नहीं मिली।
ईरान के विरुद्ध युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति अब समझौते और शांति समझौते का श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं। इससे पहले आक्रामक युद्ध के माध्यम से ईरान को तबाह करने, वहां सत्ता परिवर्तन कराने तथा उसके परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को नष्ट करने की जो महत्वाकांक्षाएं थीं, वे अधूरी रह गईं। ईरान ने अमेरिका और इजराइल के हमलों का मजबूती से सामना किया और जवाब भी दिया। विशेष रूप से जब ईरान ने कच्चे तेल और गैस को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया, तब विश्व की महाशक्ति की स्थिति कमजोर पड़ती दिखाई दी।
तीन महीने तक होर्मुज जलडमरूमध्य बंद रहने से दुनिया भर में कच्चे तेल और गैस की कमी होने लगी, महंगाई बढ़ने लगी और परिणामस्वरूप इस युद्ध की व्यापक आलोचना शुरू हो गई।
अमेरिका में भी महंगाई, तेल की कमी तथा अन्य राजनीतिक और आर्थिक समस्याएं बढ़ने लगीं। बाजार को व्यापक नुकसान होने लगा, जिसके कारण अमेरिकी राष्ट्रपति का रुख नरम पड़ गया। उन्होंने युद्ध रोककर शांति समझौते की दिशा में प्रयास शुरू किए। पेंटागन की ओर से भी ईरान के साथ शांति वार्ता पर जोर दिया जाने लगा। इसी के परिणामस्वरूप अमेरिका ने अंततः ईरान के साथ समझौता कर लिया।
विश्लेषकों का मानना है कि यह युद्ध भी किसी स्पष्ट जीत या हार के बिना समाप्त हुआ। अमेरिका की प्रवृत्ति रही है कि वह दूसरे देशों में सैन्य हस्तक्षेप करता है, वहां के बाजार, समाज और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है और फिर पीछे हट जाता है। ईरान के साथ भी युद्ध करने के बाद अब अमेरिका पीछे हटता दिखाई दे रहा है।
उल्लेखनीय है कि प्रथम विश्वयुद्ध से अब तक अमेरिका लगभग 35 बड़े युद्धों या सैन्य अभियानों में शामिल रहा है। इनमें से अनेक अभियानों का अंत बिना निर्णायक सफलता के हुआ। वर्तमान में ईरान के साथ संघर्ष में भी अमेरिका ने वैसा ही रुख अपनाया है। मध्यपूर्व के देशों को अस्थिर करने और उनकी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करने के बाद अब वह समझौते के रास्ते पर आ गया है।
इससे पहले भी कई बार, विशेषकर पिछले पांच बड़े युद्धों में, अमेरिका को भारी झटके लगे हैं। अनेक लोगों का मानना है कि उन अवसरों पर अमेरिका वस्तुतः हार गया था और उसे पीछे हटना पड़ा था। तकनीकी रूप से यह कहा जा सकता है कि किसी देश ने अमेरिका को सीधे सैन्य रूप से पराजित नहीं किया, लेकिन लंबे संघर्ष, हथियारों की कमी, रणनीतिक असफलताओं और भारी आर्थिक नुकसान के कारण उसे युद्ध अधूरा छोड़ना पड़ा।
18 जून, 1812 से 24 दिसंबर, 1814 तक अमेरिका और ब्रिटेन के बीच युद्ध चला। अमेरिका ने आरोप लगाया कि ब्रिटेन जबरन नाविकों की भर्ती कर रहा है तथा कनाडा सीमा पर ब्रिटिश समर्थित मूल निवासियों के कारण खतरा उत्पन्न हो रहा है।
राष्ट्रपति जेम्स मैडिसन ने युद्ध की घोषणा की। उस समय अमेरिका कनाडा पर कब्जा करना चाहता था, जो तब ब्रिटेन का हिस्सा माना जाता था। डेट्रॉइट और क्वीनस्टन हाइट्स जैसे अभियानों में ब्रिटिश सेना, कनाडाई मिलिशिया और मूल निवासी योद्धाओं ने अमेरिका को पराजित किया।
24 अगस्त, 1814 को ब्रिटिश सेना ने चेसापीक खाड़ी के रास्ते हमला करके वॉशिंगटन पर कब्जा कर लिया। व्हाइट हाउस, कैपिटोल और कई अन्य सरकारी भवनों को आग के हवाले कर दिया गया। इसके बाद अमेरिका को युद्धविराम करना पड़ा।
वियतनाम युद्ध में भी अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा। इतिहासकारों के अनुसार लगभग दो दशकों तक युद्ध लड़ने के बाद अमेरिका और उसके सहयोगी थक गए और उन्हें पीछे हटना पड़ा।
1955 से 1975 तक अमेरिका और वियतनाम के बीच संघर्ष चलता रहा। अंततः अमेरिका को पीछे हटना पड़ा और वियतनाम विजई रहा। लगभग 20 वर्षों तक चले इस युद्ध में अमेरिका ने परमाणु हथियारों को छोड़कर लगभग सभी प्रकार के हथियारों का उपयोग किया।
इस युद्ध में अमेरिका के लगभग 58,000 सैनिक मारे गए, जिनमें वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल थे। लगभग 11 अमेरिकी जनरलों की मृत्यु हुई। 1965 से 1973 के बीच इस युद्ध पर लगभग 120 अरब डालर खर्च हुए, जिससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था में महंगाई बढ़ गई। इसके बावजूद अमेरिका को खाली हाथ लौटना पड़ा।
दुनिया भर में यह माना जाता है कि इस युद्ध ने अमेरिका के आत्मविश्वास और वैश्विक प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुंचाई।
अफगानिस्तान में भी अमेरिका को इसी प्रकार की स्थिति का सामना करना पड़ा। 2001 में तालिबान के विरुद्ध युद्ध शुरू हुआ और लगभग दो दशक तक चलता रहा।
2021 में अचानक अमेरिकी सेनाएं अफगानिस्तान छोड़कर जाने लगीं। शुरुआती सफलता के बाद अमेरिका स्थिति को स्थाई रूप से नियंत्रित नहीं कर सका। उसकी रणनीति विफल साबित हुई और दो दशक बाद तालिबान फिर सत्ता में लौट आया।
1961 में अमेरिका ने क्यूबा में बे ऑफ पिग्स अभियान चलाया था। उद्देश्य फिदेल कास्त्रो को सत्ता से हटाना था, लेकिन अभियान असफल रहा।
कोरिया युद्ध में भी अमेरिका ने 1950 में कोरियाई प्रायद्वीप को एक करने के उद्देश्य से हस्तक्षेप किया, लेकिन वह सफल नहीं हुआ। अंततः उत्तर कोरिया और दक्षिण कोरिया अलग-अलग देशों के रूप में बने रहे और युद्धविराम करना पड़ा।
अमेरिका और ईरान के बीच हुए संघर्ष का अंत भी अचानक और अनिर्णायक रूप में हुआ। अनेक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका अपने घोषित उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सका।
सबसे पहले, ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने की उसकी योजना सफल नहीं हुई। ट्रम्प को उम्मीद थी कि अयातुल्ला खामेनेई के हटने के बाद ईरान अस्थिर हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान की मौजूदा सत्ता व्यवस्था कायम रही और अंततः अमेरिका को उसी सरकार के साथ समझौता करना पड़ा।
युद्ध के कारण उत्पन्न जनहानि, वैश्विक महंगाई और आर्थिक संकटों ने अमेरिका की नीतियों की व्यापक आलोचना कराई। ईरान के भीतर भी अमेरिका को कोई विशेष समर्थन नहीं मिला।
इसके अतिरिक्त, ईरान की तथाकथितमिसाइल सिटी का पता आज तक अमेरिका और इजराइल नहीं लगा सके। दोनों को उम्मीद थी कि लगातार हमलों के बाद वह नष्ट हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरान के हथियार भंडार भी सुरक्षित बने रहे।
विश्लेषकों के अनुसार सबसे बड़ा झटका यह रहा कि समझौते से पहले ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य खोलने से इनकार कर दिया। अमेरिका को समझौते की दिशा में बढ़ना पड़ा। साथ ही ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी समाप्त नहीं हुआ। इस विषय पर भविष्य में अलग से चर्चा करने का निर्णय लिया गया।
खाड़ी देशों को सुरक्षा प्रदान करने के अमेरिकी दावे भी पूरी तरह सफल नहीं रहे। ईरान ने अमेरिकी सहयोगी देशों को भी निशाना बनाया और अमेरिका इसे रोक नहीं सका।
