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गांधी जयंती का काशी कनेक्शन: 1929 में कैथी से गंगा पार कर सैदपुर पहुंचे थे बापू, जगाई थी स्वदेशी की अलख
 

 
 गांधी जयंती का काशी कनेक्शन: 1929 में कैथी से गंगा पार कर सैदपुर पहुंचे थे बापू, जगाई थी स्वदेशी की अलख
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2 अक्टूबर को देश महात्मा गांधी की जयंती मनाता है, लेकिन पूर्वांचल के लिए इस तारीख से जुड़ा एक और ऐतिहासिक प्रसंग है। वर्ष 1929 में अपने 60वें जन्मदिन के आसपास महात्मा गांधी पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा पर थे। वाराणसी, जौनपुर, कैथी, सैदपुर और गाजीपुर से जुड़ी उनकी इस यात्रा की स्मृतियां आज भी इन इलाकों में मौजूद हैं। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों के मुताबिक गांधी जी कैथी स्थित गंगा-गोमती संगम क्षेत्र से होते हुए गंगा पार कर औड़िहार और सैदपुर पहुंचे और लोगों के बीच स्वदेशी, खादी तथा विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का संदेश दिया।

उस दौर में गांधी जी देशभर में खादी और स्वदेशी को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ रहे थे। उनके लिए विदेशी कपड़ों का बहिष्कार केवल आर्थिक मुद्दा नहीं था, बल्कि भारत के ग्रामीण कारीगरों और बुनकरों को आत्मनिर्भर बनाने तथा ब्रिटिश आर्थिक व्यवस्था पर निर्भरता कम करने का माध्यम भी था। गांधी के स्वदेशी विचार में स्थानीय उत्पादन, विशेष रूप से हाथ से काता और बुना खादी का कपड़ा, महत्वपूर्ण स्थान रखता था।

सितंबर 1929 में काशी पहुंचे थे गांधी

गांधी जी की 1929 की यात्रा के उपलब्ध कालक्रम के मुताबिक वह 25 सितंबर को बनारस में थे, जहां उन्होंने वंचित समुदाय से जुड़े एक कार्यक्रम और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को संबोधित किया था। अगले दिन 26 सितंबर को उन्होंने महिलाओं की सभाओं तथा काशी विद्यापीठ के कार्यक्रम में हिस्सा लिया। इसके बाद उनकी पूर्वी उत्तर प्रदेश की यात्रा आगे बढ़ी।

इसी क्रम में अक्टूबर की शुरुआत में उनकी यात्रा जौनपुर, आजमगढ़ और गाजीपुर क्षेत्र तक पहुंची। स्थानीय इतिहास और गाजीपुर-सैदपुर क्षेत्र में संरक्षित स्मृतियों में इस यात्रा का विशेष उल्लेख मिलता है।

कैथी पहुंचने पर उमड़ी थी लोगों की भीड़

स्थानीय विवरणों के अनुसार गांधी जी अपनी पत्नी कस्तूरबा गांधी और सहयोगियों के साथ गंगा-गोमती संगम क्षेत्र पहुंचे थे। उनके साथ मीरा बहन, आचार्य जेबी कृपलानी, महादेव देसाई और देवदास गांधी सहित कई सहयोगियों के मौजूद रहने का उल्लेख मिलता है। गांधी जी की एक झलक पाने और उनका स्वागत करने के लिए बड़ी संख्या में लोग एकत्र हुए थे।

कैथी आज वाराणसी जिले में गंगा और गोमती के संगम के लिए प्रसिद्ध है। इसी क्षेत्र से आगे गांधी जी के औड़िहार और सैदपुर जाने की स्मृतियां स्थानीय इतिहास में दर्ज हैं।

गंगा पार कर औड़िहार के वाराह रूप घाट पहुंचे

विवरणों के मुताबिक कैथी और गंगा-गोमती संगम क्षेत्र से यात्रा आगे बढ़ी तो गांधी जी औड़िहार के निकट वाराह रूप घाट पहुंचे। यहां उनके कुछ समय रुकने और संध्या वंदन करने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद वह सैदपुर की ओर रवाना हुए।

गांधी जी के आगमन की सूचना पहले से फैल चुकी थी। रास्ते में बड़ी संख्या में लोग उनके स्वागत के लिए मौजूद थे। उस समय स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों के कारण पूर्वांचल में भी राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ रही थी।

सैदपुर में सभा, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का संदेश

सैदपुर पहुंचने के बाद गांधी जी ने तत्कालीन मिडिल स्कूल में आयोजित जनसभा को संबोधित किया। यह स्थान बाद के वर्षों में शैक्षिक परिसर के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में उनके भाषण का मुख्य स्वर स्वराज, खादी और स्वतंत्रता आंदोलन में आम लोगों की भागीदारी से जुड़ा बताया गया है।

स्थानीय परंपरा में इस यात्रा को विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रचार से भी जोड़ा जाता है। कुछ विवरणों में सैदपुर में विदेशी वस्त्रों की होली जलाए जाने का उल्लेख है। गांधी के उस दौर के स्वदेशी अभियान में विदेशी कपड़ों के बहिष्कार को स्वतंत्रता संघर्ष के आर्थिक हथियार के रूप में प्रमुखता दी जा रही थी।

सैदपुर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित आत्माराम पांडेय के आवास पर गांधी जी के स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों से मिलने का उल्लेख भी मिलता है। यहां चरखा संघ से जुड़ी गतिविधियों और लोगों को खादी अपनाने के लिए प्रेरित किए जाने की स्मृतियां आज भी स्थानीय इतिहास का हिस्सा हैं।

लोगों ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए दिया था चंदा

उस समय सैदपुर से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक समाचार पत्र 'आईना-ए-तहजीब' के हवाले से इतिहासकारों ने उल्लेख किया है कि गांधी जी की सभा स्वतंत्रता प्राप्ति और जनभागीदारी पर केंद्रित थी। सभा के बाद उन्हें स्वतंत्रता आंदोलन के लिए करीब 500 रुपये की सहयोग राशि तथा स्थानीय महिलाओं द्वारा तैयार खादी पर लिखा मांगपत्र दिए जाने की बात भी सामने आती है।

उस समय 500 रुपये की राशि आज के मुकाबले काफी महत्वपूर्ण मानी जाती थी और इससे यह भी संकेत मिलता है कि राष्ट्रीय आंदोलन को लेकर स्थानीय लोगों में कितना उत्साह था।

सैदपुर से गाजीपुर निकले, रास्ते में खराब हुई गाड़ी

सैदपुर में कार्यक्रम के बाद गांधी जी गाजीपुर जिला मुख्यालय की ओर रवाना हुए। यात्रा के दौरान नंदगंज क्षेत्र में उनकी मोटरगाड़ी खराब हो गई। स्थानीय विवरण बताते हैं कि आगे की यात्रा के लिए पहले घोड़ा गाड़ी का इंतजाम किया गया और बाद में दूसरी मोटरगाड़ी की व्यवस्था हुई।

गाजीपुर पहुंचने के बाद गांधी जी गोराबाजार क्षेत्र स्थित एक भवन में ठहरे और बाद में लंका मैदान में आयोजित बड़ी जनसभा को संबोधित किया। उन्हें सुनने के लिए वहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे।

गांधी जी के पदचिह्न आज भी सहेजे हुए है सैदपुर

सैदपुर में गांधी जी की इस ऐतिहासिक यात्रा से जुड़े कई स्थानों की स्मृतियां आज भी स्थानीय लोगों के बीच जीवित हैं। जिस रास्ते से उनके गुजरने का उल्लेख मिलता है, उसे स्थानीय स्तर पर 'गांधी मार्ग' के नाम से जाना जाता रहा है। बूढ़ेनाथ महादेव मंदिर और आसपास के घाटों से भी उनकी यात्रा की स्मृतियां जुड़ी हैं।

औड़िहार, सैदपुर और गाजीपुर क्षेत्र में खादी और गांधी आश्रम की गतिविधियों के विकास को भी इस दौर की स्वदेशी चेतना से जोड़कर देखा जाता है।

कैथी में गांधी स्मारक बनाने की उठी मांग

97वीं वर्षगांठ के अवसर पर कैथी में गांधी जी की इस यात्रा को फिर याद किया गया। आशा लाइब्रेरी की छात्राओं ने गंगा-गोमती संगम तक गांधी संदेश पदयात्रा निकाली और संगम पर स्मरण सभा आयोजित की। कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कैथी में गांधी जी के आगमन से जुड़ा स्थायी स्मारक बनाने की मांग उठाई, ताकि यहां आने वाले पर्यटकों और नई पीढ़ी को इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व की जानकारी मिल सके।

वरिष्ठ सर्वोदयी कार्यकर्ता ईश्वर चंद्र ने कहा कि गांधी जी की प्रासंगिकता केवल इतिहास तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन के विचार आज भी दुनिया में स्वीकार किए जाते हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता वल्लभाचार्य पाण्डेय ने कहा कि गंगा-गोमती संगम पर गांधी जी के आगमन से जुड़े इतिहास को संरक्षित करने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के मंत्री काजी फरीद आलम ने कहा कि गांधी जी के पदचिह्न केवल उन भौतिक स्थानों तक सीमित नहीं हैं जहां वह पहुंचे थे, बल्कि उनके विचारों और सिद्धांतों में भी मौजूद हैं।

तारीख को लेकर ऐतिहासिक स्रोतों में अंतर

गांधी जी की इस यात्रा की तारीख को लेकर उपलब्ध स्रोतों में मामूली अंतर भी मिलता है। गाजीपुर और सैदपुर की स्थानीय ऐतिहासिक परंपरा तथा कई प्रकाशित विवरण उनके कैथी-सैदपुर आगमन को 2 अक्टूबर 1929, यानी उनके 60वें जन्मदिन से जोड़ते हैं। वहीं गांधी जी की एक प्रकाशित कालक्रम-सूची में 2 अक्टूबर को जौनपुर और 3 अक्टूबर को गाजीपुर दर्ज है।

हालांकि, इस बात पर स्रोतों में व्यापक सहमति है कि अक्टूबर 1929 की इसी पूर्वांचल यात्रा के दौरान गांधी जी बनारस-जौनपुर क्षेत्र से होते हुए गाजीपुर पहुंचे और यहां स्वराज, खादी, स्वदेशी और विदेशी कपड़ों के बहिष्कार के संदेश को लोगों तक पहुंचाया।