लखनऊ अग्निकांड: उम्मीदों की राख
अलीगंज की गलियों में, सहसा एक चीख उठी,
आग की लपटों में लिपटी, सपनों की तस्वीर दिखी।
पढ़ने गए थे जो बच्चे, रोशन करने को अपना कल,
बन गई वो इमारत उनकी, मौत का खौफनाक दल।
तारों के सहारे लटके, अपनों को आखिरी बार पुकारा,
'बचा लो हमें'- माँ-बाप से, हर बच्चे ने गुहार लगाई।
धुएँ और आग के उस मंजर में, आँखों में भर आया पानी,
चीर कर कलेजा रख देगी, लखनऊ के इस अग्निकांड की कहानी!
टूटे शीशे, टूटे दरवाजे, और अपनों के आशियाने,
सिस्टम की लापरवाही ने, छीन लिए कई परवाने।
पढ़ाई की वो मेजें-कुर्सियाँ, अब खामोश हैं बिल्कुल,
नीलेश-अनामिका जैसे कितनों के सपने हो गए धूल।
असमय काल के गाल में समा गए, वो मासूम से चेहरे,
पूछ रहा है हर कोई, आखिर कब सुधरेंगे ये पहरे?
आँखें नम हैं, सीने में भारी है गम का समंदर,
लखनऊ के इस हादसे से, सिहर उठा आज पूरा अम्बर।
जाँच चलेगी सालों तक, फाइलों में दब जाएगा सच,
पर माँ की सूनी गोद का, कौन देगा हिसाब अब?
बेटा कोचिंग गया था साहब, ये कहकर रोएगी कब तक,
खिड़की नहीं, अब इंसाफ का दरवाजा खोलो सब।
रचनाकार- पल्लवी श्रीवास्तव
ममरखा, अरेराज, पूर्वी चम्पारण (बिहार )
