Movie prime

-: प्रकृति का प्रतिशोध:-

 
-: प्रकृति का प्रतिशोध:-
WhatsApp Channel Join Now
Instagram Profile Join Now

-: प्रकृति का प्रतिशोध:-
प्रकृति से सबकुछ  मिला,
          सहेज सके न हम इसको।
स्वार्थ  सिध्द  में सब ध्वस्त  किया,
       कहो दोष दें अब  किसको??
जिनकी चहक से भोर होती थी,
        कहाँ गई  वह गौरैया ?
बाल कथा में मन बहलाती,
       नजर न आती सोन चिरैया।।
गगन पटा पड़ा है नित,
        नए नए  विमानों से।
किन्तु सूना हो रहा है ,
       चील कपोत विहंगों से।।
विटप विहीन  कानन कर  डाले,
         खडे किए  ईंटों के जंगल।
नदियाँ बनकर  नाले रह गई, 
       कैसे हो सृष्टी का मंगल?
काल के कपाल पर,
             लिखने तो थे स्वर्णाक्षर।
लिख डाले हैं फटते बादल,
          दरकते पहाड़ों के मंज़र।।
पावस ऋतु अब लगी डराने,
     जल बरसाए घटा जब  काली।
नदियाँ तोड़  किनारे चल दीं,
          बहा ले गई  गाँव  "धराली"।।
प्रतिशोध  ले रही प्रकृति ,
         यह सब मानव  की करनी है।
करते रहें फरियाद  मगर, 
    यह दण्ड  राशि तो भरनी है।।
छोड़ पूर्व  की भूलों को,
          आओ नव चेतन  हो जाएँ।
अब विनाश  न हो पृथ्वी का,
       सब मिलकर  कसम ये खाएँ।।
साहस लेकर  आगे बढें सब
      प्रण करना है हमको पूरा।
देखो ठहर ना जाना थककर,
      सफर कहीं रह जाए  न अधूरा।।