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क्यों धान की खेती बन रही ग्लोबल वार्मिंग की बड़ी वजह? नई स्टडी में चौंकाने वाला खुलासा

नई वैज्ञानिक स्टडी में खुलासा हुआ है कि धान की खेती से निकलने वाली मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड गैसें ग्लोबल वार्मिंग को तेजी से बढ़ा रही हैं। जानिए कैसे चावल की खेती जलवायु परिवर्तन की बड़ी वजह बनती जा रही है और वैज्ञानिक इसके समाधान के लिए क्या सुझाव दे रहे हैं।

 
Rice Farming Climate Change
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Rice Farming Climate Change: दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी की थाली में रोज पहुंचने वाला चावल अब जलवायु परिवर्तन को लेकर बड़ी चिंता की वजह बनता जा रहा है। भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया समेत कई देशों में करोड़ों लोग चावल पर निर्भर हैं, लेकिन वैज्ञानिकों की नई स्टडी ने चेतावनी दी है कि धान की खेती से निकलने वाली गैसें ग्लोबल वार्मिंग को तेजी से बढ़ा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कुछ दशकों में धान के खेतों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन लगभग दोगुना हो चुका है। यही वजह है कि अब वैज्ञानिक खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

धान की खेती से क्यों बढ़ रहा है प्रदूषण?

धान की खेती सामान्य फसलों से अलग होती है। इसके खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता है। जब मिट्टी में लगातार पानी जमा रहता है, तब वहां ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। ऐसे वातावरण में कुछ विशेष प्रकार के सूक्ष्म जीव सक्रिय हो जाते हैं।

ये सूक्ष्म जीव मिट्टी में मौजूद जैविक पदार्थों को तोड़ते हैं और इस प्रक्रिया में मीथेन गैस पैदा होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, मीथेन एक बेहद खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कहीं ज्यादा तेजी से धरती का तापमान बढ़ा सकती है।

23 करोड़ कारों जितना प्रदूषण छोड़ रहे धान के खेत

स्टडी के मुताबिक, 2010 के दशक में हर साल धान के खेतों से लगभग 1.1 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड के बराबर ग्रीनहाउस गैसें निकलीं। वैज्ञानिकों ने इसकी तुलना करीब 23.9 करोड़ कारों से होने वाले वार्षिक प्रदूषण से की है।

रिपोर्ट में कहा गया कि अब पशुपालन के बाद धान की खेती कृषि क्षेत्र में प्रदूषण का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत बन चुकी है।

खेती का बढ़ता दायरा बना बड़ी वजह

विशेषज्ञों के मुताबिक, धान की खेती का लगातार विस्तार भी उत्सर्जन बढ़ने का प्रमुख कारण है। उदाहरण के तौर पर अफ्रीका में 1960 के बाद धान की खेती का क्षेत्र लगभग दोगुना हो गया। इसके साथ ही वहां मीथेन गैस का उत्सर्जन भी तेजी से बढ़ा।

इसके अलावा ज्यादा उत्पादन हासिल करने के लिए किसान अब अधिक रासायनिक खाद, गोबर और जैविक पदार्थों का इस्तेमाल कर रहे हैं। घनी बुवाई और हाई-यील्ड किस्में भी उत्सर्जन बढ़ाने में भूमिका निभा रही हैं।

खेत में पुआल छोड़ना कैसे बन रहा खतरा?

कटाई के बाद खेत में धान का पुआल छोड़ना लंबे समय से मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने का तरीका माना जाता रहा है। लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया कि यही प्रक्रिया मीथेन उत्सर्जन को बढ़ा रही है।

जब पुआल मिट्टी में मिलाया जाता है तो उसमें जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती है। बाद में माइक्रोब्स इन्हें तोड़ते हैं और बड़ी मात्रा में मीथेन गैस निकलती है। रिपोर्ट के अनुसार, 1960 के बाद उत्सर्जन में हुई कुल बढ़ोतरी में लगभग 18 प्रतिशत योगदान इसी प्रक्रिया का रहा।

बढ़ता तापमान और गंभीर बना रहा संकट

वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि ग्लोबल वार्मिंग खुद इस समस्या को और बढ़ा सकती है। गर्म मौसम में मिट्टी के सूक्ष्म जीव ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं, जिससे मीथेन गैस का उत्सर्जन और तेज हो सकता है।

यानी जलवायु परिवर्तन और धान की खेती से निकलने वाली गैसें एक-दूसरे को और खतरनाक बना रही हैं।

रासायनिक खाद और सिंचाई भी जिम्मेदार

स्टडी में बताया गया कि साल 2000 के बाद सिंथेटिक नाइट्रोजन खाद का इस्तेमाल लगभग 76 प्रतिशत बढ़ गया। इससे नाइट्रस ऑक्साइड गैस का उत्सर्जन भी तेजी से बढ़ा है।

नाइट्रस ऑक्साइड को भी बेहद शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस माना जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, सिंचाई के तरीकों में बदलाव भी गैस उत्सर्जन को प्रभावित करता है।

पहले खेतों में लगातार पानी भरा रहता था, जिससे लगातार मीथेन गैस बनती थी। अब कई किसान खेतों को बीच-बीच में सुखाने लगे हैं। इससे मीथेन गैस तो कम होती है, लेकिन मिट्टी के बार-बार गीले और सूखे होने से नाइट्रस ऑक्साइड थोड़ी बढ़ जाती है।

वैज्ञानिकों ने कैसे की रिसर्च?

इस स्टडी के लिए वैज्ञानिकों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कंप्यूटर मॉडलिंग और दुनियाभर के 1200 से ज्यादा खेतों में हुए प्रयोगों का सहारा लिया।

1961 से 2020 तक के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह समझने की कोशिश की गई कि कौन-सी तकनीकें सबसे ज्यादा प्रदूषण पैदा कर रही हैं और किन तरीकों से इसे कम किया जा सकता है।

क्या धान की खेती से प्रदूषण कम हो सकता है?

वैज्ञानिकों का कहना है कि सही तकनीक अपनाकर धान से होने वाले प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है और इससे उत्पादन पर बड़ा असर भी नहीं पड़ेगा।

1. खाद का संतुलित इस्तेमाल

जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन खाद डालने से प्रदूषण और पानी दोनों प्रभावित होते हैं। सीमित और संतुलित उपयोग से उत्सर्जन कम किया जा सकता है।

2. खेतों को बीच-बीच में सुखाना

धान के खेतों में लगातार पानी भरकर रखने के बजाय कुछ समय के लिए खेत सुखाने से मीथेन गैस कम हो सकती है।

3. पुआल का बेहतर उपयोग

वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि पुआल को सीधे मिट्टी में मिलाने के बजाय उसे “बायोचार” में बदला जा सकता है। इसमें पुआल को कम ऑक्सीजन में जलाकर मिट्टी में मिलाया जाता है, जिससे कार्बन लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और गैस उत्सर्जन कम होता है।

हर देश के लिए अलग होगा समाधान

वैज्ञानिकों ने साफ कहा कि पूरी दुनिया में एक ही तरीका हर जगह कारगर नहीं होगा। गर्म और ठंडे क्षेत्रों की जलवायु अलग होती है, इसलिए हर देश और क्षेत्र को अपनी परिस्थितियों के अनुसार समाधान चुनने होंगे।

2050 तक क्या हो सकता है असर?

स्टडी के मुताबिक, अगर दुनिया भर के किसान अभी उपलब्ध ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ खेती तकनीकों को अपनाएं तो 2050 तक धान से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 10 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।

हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में और बड़े समाधान विकसित करने होंगे ताकि खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके।

चुनौती क्या है?

धान की खेती दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उत्पादन भी बना रहे और पर्यावरण को नुकसान भी कम हो।

विशेषज्ञों का कहना है कि बेहतर तकनीक, संतुलित खेती और वैज्ञानिक तरीकों की मदद से यह संतुलन संभव है। आने वाले समय में जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में खेती के तरीके सबसे अहम भूमिका निभाने वाले हैं।