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सोनभद्र के 'पसीजने वाले' पत्थर देते हैं बारिश का संकेत! हजारों साल पुरानी आदिवासी परंपरा आज भी जिंदा
 

 
 सोनभद्र के 'पसीजने वाले' पत्थर देते हैं बारिश का संकेत! हजारों साल पुरानी आदिवासी परंपरा आज भी जिंदा
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सोनभद्र। जिले के म्योरपुर ब्लॉक स्थित रास पहरी और मधुबन की मुर गुड्डी पहाड़ी पर मौजूद हजारों वर्ष पुराने मेगालिथ (महापाषाण) आज भी आदिवासी समाज के लिए मौसम का प्राकृतिक संकेतक माने जाते हैं। स्थानीय लोगों का विश्वास है कि जब इन विशाल पत्थरों की सतह पर नमी के कारण पानी की महीन बूंदें उभरने लगती हैं, तो कुछ ही दिनों में अच्छी बारिश होती है। भले ही इस मान्यता की वैज्ञानिक पुष्टि पूरी तरह न हुई हो, लेकिन आदिवासी समाज सदियों से इस पारंपरिक ज्ञान पर भरोसा करता आ रहा है।

बारिश से पहले 'पसीजने' लगते हैं पत्थर

म्योरपुर के रास पहरी और मधुबन स्थित मुर गुड्डी पहाड़ी पर स्थापित प्राचीन मेगालिथ स्थल आदिवासी संस्कृति, लोक परंपरा और प्रकृति के साथ उनके गहरे संबंध का प्रतीक हैं। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, मानसून आने से पहले इन पत्थरों की सतह पर सुबह के समय असामान्य नमी, पानी की महीन बूंदें, रंग में बदलाव और काई की नमी बढ़ जाती है। ग्रामीण इसे पत्थरों का "पसीजना" कहते हैं और इसे अच्छी बारिश का संकेत मानते हैं।

राम वृक्ष गोंड, बेचन, सूरजमन, धन सिंह और मोहर शाह जैसे ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है और आज भी लोग इन प्राकृतिक संकेतों के आधार पर मौसम का अनुमान लगाते हैं।

वैज्ञानिक भी पूरी तरह नहीं करते खारिज

विशेषज्ञों के अनुसार, इस लोकमान्यता की वैज्ञानिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि मानसून से पहले वातावरण में बढ़ने वाली आर्द्रता, स्थानीय सूक्ष्म जलवायु (माइक्रोक्लाइमेट) और चट्टानों की संरचना के कारण उनकी सतह पर संघनन (कंडेनसेशन) दिखाई दे सकता है। यह प्रक्रिया मानसून के करीब आने का संकेत हो सकती है।

पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक अध्ययन और व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाए, तो यह मौसम विज्ञान, पुरातत्व और सांस्कृतिक विरासत के क्षेत्र में महत्वपूर्ण शोध का आधार बन सकता है। हालांकि, इतनी महत्वपूर्ण धरोहर होने के बावजूद इन मेगालिथ स्थलों पर आज भी पर्याप्त सुरक्षा, घेराबंदी और सूचना पट्टों का अभाव है, जिससे इनके संरक्षण की आवश्यकता और अधिक बढ़ जाती है।