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चीनी के दाम ने बिगाड़ा बजट, आखिर कौन तय करता है इसका भाव? समझिए किसान और सरकार का पूरा रोल

 
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चाय की प्याली हो या त्योहारों की मिठाई, चीनी हमारी रोजमर्रा की जरूरत का अहम हिस्सा है। ऐसे में जब चीनी के दाम अचानक बढ़ते हैं तो इसका असर सीधे आम आदमी की जेब पर पड़ता है। देश के कई शहरों में चीनी की खुदरा कीमत करीब 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंचने की बात सामने आ रही है। करीब डेढ़ महीने पहले जहां थोक बाजार में चीनी 42 से 45 रुपये किलो के आसपास मिल रही थी, वहीं अब इसका भाव करीब 62 रुपये किलो तक पहुंच गया है। कीमतों में इस तेजी का असर घरों के बजट के साथ-साथ चाय की दुकानों, मिठाई कारोबार और खाद्य उद्योग पर भी दिखाई दे रहा है।

आखिर चीनी के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?

व्यापारियों के मुताबिक, बाजार में मांग बढ़ने और उपलब्धता कम होने से चीनी की कीमतों में तेजी आई है। इसके अलावा एथेनॉल नीति और चीनी के उत्पादन से जुड़े फैसलों का भी बाजार पर असर पड़ता है। बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को मंजूरी दी है। इसके साथ ही बड़े खरीदारों के लिए स्टॉक लिमिट जैसे कदम भी उठाए गए हैं, ताकि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा न हो और कीमतों को नियंत्रित रखा जा सके।

भारत में चीनी की कीमत कौन तय करता है?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर चीनी का भाव तय कौन करता है? इसका जवाब थोड़ा अलग है। किसान सीधे बाजार में बिकने वाली चीनी की कीमत तय नहीं करता। केंद्र सरकार चीनी उद्योग को जरूरी वस्तु अधिनियम, 1955 के तहत नियंत्रित करती है और उत्पादन, बिक्री, स्टॉक, आयात तथा निर्यात पर नियम बना सकती है।

सरकार घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बनाए रखने के लिए चीनी मिलों के बिक्री कोटे तय करने, आयात-निर्यात को नियंत्रित करने और जरूरत पड़ने पर स्टॉक लिमिट लगाने जैसे फैसले ले सकती है। कीमतों में असामान्य बढ़ोतरी होने पर बाजार की निगरानी भी बढ़ाई जाती है।

किसान का क्या रोल है?

चीनी की कीमत तय करने में किसान की भूमिका मुख्य रूप से गन्ने की कीमत तक सीमित रहती है। केंद्र सरकार हर चीनी सीजन के लिए गन्ने की FRP यानी Fair and Remunerative Price तय करती है। यह कीमत कृषि लागत एवं मूल्य आयोग यानी CACP की सिफारिशों और राज्य सरकारों समेत संबंधित पक्षों से चर्चा के आधार पर तय की जाती है।

इसके अलावा कुछ राज्य सरकारें किसानों के लिए SAP यानी State Advised Price भी घोषित करती हैं। यह कीमत केंद्र की FRP से अधिक हो सकती है। यानी किसान अपनी मर्जी से गन्ने का न्यूनतम खरीद मूल्य तय नहीं करता, बल्कि सरकार द्वारा तय व्यवस्था के तहत उसे भुगतान किया जाता है।

2025-26 सीजन में गन्ने की FRP कितनी है?

चीनी सीजन 2025-26 के लिए गन्ने की FRP 355 रुपये प्रति क्विंटल तय की गई है। यह दर 10.25 फीसदी की बेसिक रिकवरी दर के आधार पर है। अगर गन्ने से चीनी की रिकवरी इससे अधिक होती है तो किसानों को प्रत्येक 0.1 फीसदी अतिरिक्त रिकवरी पर 3.46 रुपये प्रति क्विंटल का प्रीमियम दिया जाता है।

वहीं 9.5 फीसदी से कम रिकवरी वाले किसानों के लिए भी सरकार ने राहत का प्रावधान रखा है। ऐसे किसानों को कटौती के बजाय 329.05 रुपये प्रति क्विंटल की दर मिलने की व्यवस्था है।

यूपी समेत कई राज्यों में अलग कीमत

उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड जैसे राज्य अपनी State Advised Price यानी SAP 
घोषित करते हैं। यह कीमत कई बार केंद्र सरकार की FRP से अधिक होती है।

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में SAP के मुताबिक किसानों को गन्ने का भुगतान चीनी मिलों की जिम्मेदारी होती है। वहीं पंजाब में राज्य सरकार और हरियाणा में राज्य सरकार की ओर से सब्सिडी के माध्यम से FRP और SAP के बीच के अंतर को पूरा करने की व्यवस्था की जाती है।

तो क्या किसान चीनी का भाव तय करता है?

सीधे तौर पर नहीं। किसान को गन्ने का दाम सरकार द्वारा तय FRP या राज्य सरकार की SAP व्यवस्था के तहत मिलता है। इसके बाद गन्ने से चीनी तैयार करने वाली मिलों की लागत, उत्पादन, बाजार में मांग और आपूर्ति, सरकारी नीतियां, स्टॉक, आयात-निर्यात और अन्य बाजार स्थितियां चीनी के अंतिम दाम को प्रभावित करती हैं।

यानी गन्ने की कीमत तय करने में सरकार की बड़ी भूमिका है, जबकि बाजार में चीनी की कीमत कई आर्थिक और नीतिगत परिस्थितियों से मिलकर तय होती है। यही वजह है कि गन्ने की कीमत और बाजार में बिकने वाली चीनी की कीमत एक जैसी नहीं होती।