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बुझती सांसें थकती धरती

 
बुझती सांसें थकती धरती
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कितनी अद्भुत पृथ्वी हमारी ।
इस दुनिया में सबसे प्यारी ।
पृथ्वी पर ही जीवन अपना ।
पूरा होता यहीं हर सपना ।

यही है मातृ भूमि हमारी ।
सारे जग में सबसे न्यारी ।
पर अब इसकी दशा बुरी है ।
चारों ओर दूषित हवा घुली है ।

देखो ! धरती मां है सुबकती ।
दुःखी हो जैसे आहें भरती ।
कौन सुनेगा इन आहों को ?
रोकेगा दूषित हवाओं को  ?

नीला अंबर हुआ है काला ।
हवा हुई है विषैली ।
हरियाली की चादर कैसे  ,
हो गई है मैली ?

यदि प्रदूषण नहीं रुका तो,
कैसे बचेगी प्यारी धरती ?
पेड़ यदि कटते जाएंगे ।
शुद्ध हवा कैसे पाएंगे ?

कब तक ये अत्याचार चलेगा ?
धरती मां की रक्षा कौन करेगा ?
कब तक खामोश रहेगी यह धरती, और सहेगी अत्याचार,
कण-कण इसका चीख रहा है, सुन लो इसकी पुकार ।

लेखिका- प्रगति दत्त (अलीगढ़)