युद्ध की विभीषिका
चार साल से झेल रहा जग,
तरह-तरह के युद्ध ।
मानव दानव बन, कर रहा,
शांति मार्ग अवरुद्ध। ।
रसिया,यूक्रेन यहाँ लड़ रहे,
वहाँ इजराइल संग गाज़ा।
चीन सोच रहा कैसे बजाए,
ताइवान का बाज़ा ।।
'अफगान'और'ईराक' नियंत्रित,
करके जो इठलाया।
उस 'अमरिका' को 'ईरान' ने,
निज घुटने पर लाया।।
कहा "अटल"जी ने था कि,
"चिंगारी का खेल बुरा है।"
हम कहते बम,एटम,
हथियारों का खेल बुरा है।।
नए खेल से जूझ रहे सब,
मान रहे इनसे भीषण।
अड़ियल देशों का घातक,
''तेल का खेल'' बहुत बुरा है।।
गिरती इमारतें,बंद हुई मिलें,
अर्थ का हो रहा है पतन।
समर आग में जल रहे,
कैसे सुरक्षित हों ये वतन।।
भूख, बीमारी और पलायन,
जनता को सहना पड़ता है।
मौत के अम्बार लग रहे,
अपनों को खोना पड़ता है।।
रण विभिषिकाओं का अब,
करना होगा इनको अंत।
वैश्विक स्तर पर बढ़े,
सद्भाव पूर्ण संबंध ।।
इन्दिरा 'प्रबुद्ध ' शर्मा जयपुर
(राजस्थान)
