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गिनी-बिसाऊ के जंगलों का रहस्य: आखिर क्यों पेड़ों पर पत्थर फेंकते हैं चिंपैंजी?
 

 
गिनी-बिसाऊ के जंगलों का रहस्य: आखिर क्यों पेड़ों पर पत्थर फेंकते हैं चिंपैंजी?
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पश्चिम अफ्रीका के घने जंगलों में रहने वाले चिंपैंजियों का एक रहस्यमय व्यवहार इन दिनों वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय बना हुआ है। गिनी-बिसाऊ के बोए (Boé) क्षेत्र में पाए जाने वाले जंगली चिंपैंजी विशेष प्रकार के पेड़ों पर बड़े-बड़े पत्थर फेंकते हैं और समय के साथ इन पेड़ों के नीचे पत्थरों का ढेर जमा हो जाता है। वैज्ञानिक इस अनोखी गतिविधि को "अक्यूम्युलेटिव स्टोन थ्रोइंग" (Accumulative Stone Throwing) नाम देते हैं।

यह व्यवहार पहली बार 2016 में जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी और चिंबो फाउंडेशन के शोधकर्ताओं द्वारा विस्तार से दर्ज किया गया था। बाद के अध्ययनों में यह पाया गया कि यह केवल एक खेल नहीं, बल्कि चिंपैंजियों की जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा हो सकता है।

दूर तक संदेश पहुंचाने का अनोखा माध्यम

शोधकर्ताओं के अनुसार, नर चिंपैंजी अक्सर किसी विशाल और खोखले तने वाले पेड़ के पास पहुंचते हैं, जोर-जोर से आवाजें निकालते हैं जिन्हें "पैंट-हूट" (Pant Hoot) कहा जाता है, और फिर पत्थरों को पूरी ताकत से पेड़ के तने पर दे मारते हैं।

पत्थर के टकराने से उत्पन्न होने वाली गूंज सामान्य हाथ या पैर से पेड़ पीटने की तुलना में कहीं अधिक दूर तक सुनाई देती है। वैज्ञानिक इसे "स्टोन-असिस्टेड ड्रमिंग" कहते हैं। माना जाता है कि यह तकनीक घने जंगलों में कई किलोमीटर दूर मौजूद अन्य चिंपैंजियों तक संदेश पहुंचाने में मदद करती है।

ताकत और प्रभुत्व दिखाने का तरीका

अध्ययनों से पता चलता है कि इस व्यवहार में अधिकांश भागीदारी वयस्क नर चिंपैंजियों की होती है। वे अपने क्षेत्र में प्रभाव जमाने, प्रतिद्वंद्वियों को चेतावनी देने या समूह के भीतर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ऐसा करते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्यवहार किसी पारंपरिक मानव समारोह में ढोल बजाने या नृत्य के माध्यम से शक्ति प्रदर्शन करने जैसा प्रतीत होता है।

चिंपैंजियों की सांस्कृतिक विरासत

सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि पत्थर फेंकने का यह व्यवहार सभी चिंपैंजियों में नहीं पाया जाता। अब तक यह केवल पश्चिम अफ्रीका के कुछ सीमित क्षेत्रों—गिनी-बिसाऊ, गिनी, लाइबेरिया और कोटे डी आइवर—में रहने वाले चिंपैंजी समूहों में दर्ज किया गया है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि युवा चिंपैंजी अपने बड़े सदस्यों को देखकर यह तकनीक सीखते हैं। यही कारण है कि इसे चिंपैंजियों की "सांस्कृतिक परंपरा" माना जा रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि मनुष्यों की तरह अन्य प्राइमेट प्रजातियों में भी ज्ञान और व्यवहार पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित हो सकता है।

क्या यह इलाके की सीमा तय करने का तरीका है?

कुछ शोधकर्ताओं का यह भी मानना है कि पेड़ों के नीचे जमा पत्थरों के ढेर किसी प्रकार के प्राकृतिक संकेतक या स्मारक की तरह काम कर सकते हैं। ये ढेर समूहों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मार्गों या क्षेत्रीय सीमाओं को दर्शाने में सहायक हो सकते हैं।

हालांकि इस सिद्धांत की पुष्टि के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है।

इंसानों के विकास को समझने की नई कड़ी

विशेषज्ञों का कहना है कि यह खोज केवल चिंपैंजियों के व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि मानव विकास के अध्ययन के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है।

अब तक माना जाता था कि चिंपैंजी पत्थरों का उपयोग मुख्य रूप से भोजन प्राप्त करने के लिए करते हैं, जैसे नट तोड़ना या कीड़ों को निकालना। लेकिन यह अध्ययन दर्शाता है कि वे पत्थरों का इस्तेमाल सामाजिक संचार, पहचान और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए भी कर सकते हैं।

खनन परियोजनाओं से मंडरा रहा खतरा

गिनी-बिसाऊ के बोए क्षेत्र में बॉक्साइट खनन परियोजनाओं के विस्तार से चिंपैंजियों के प्राकृतिक आवास पर खतरा बढ़ गया है। जंगलों की कटाई और मानवीय गतिविधियों के विस्तार से न केवल इन दुर्लभ प्राणियों की आबादी प्रभावित हो सकती है, बल्कि उनकी हजारों वर्षों में विकसित हुई यह अनूठी सांस्कृतिक परंपरा भी हमेशा के लिए समाप्त हो सकती है।

वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन क्षेत्रों की प्रभावी सुरक्षा नहीं की गई, तो मानव इतिहास और प्राइमेट व्यवहार से जुड़ा यह अनमोल अध्याय आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल वैज्ञानिक अभिलेखों तक सीमित रह जाएगा।