आखिर क्यों?
सामाजिक बंधन खोल दिए,
जाकर पंखों को फैलाओ ।
इन्द्रधनुष से सतरंगी सपने,
देखे जो पूरे कर आओ।।
होती घर की इज्जत बेटी,
प्यार करे पूरा परिवार।
कभी ना कुछ ऐसा ही करेगी,
सदमे में आए घर -द्वार।।
कुछ पगली हो रही निरंकुश,
कैसे होगा इनका उपचार?
ना इनमें अनुशासन ही है,
ना ही शेष रहा संस्कार। ।
स्वेच्छचारी और लालची,
निज मनमानी बढ़ा रही हैं।
साजन हो या हो मंगेतर,
सबको बलि में चढ़ा रही हैं।।
कितने परिवारों के कुलदीपक,
ड्रम में दफन किए जायेंगे?
कितनी माँ के नयन के तारे,
खाई में फेंके जायेंगे ??
अनबन ,उलझन गर कोई थी,
जा सकती थी सब सुलझाई।
प्राण छीन लिए जिन बेटों के,
कहाँ से लाऊँ वह तरुणाई?
'सावित्री' का देश है जो,
'यमराज' पराजित कर आई।
धर्म पतिव्रत का पालन कर,
प्राण 'सत्यवान' के लेआई।।
संपति पाने का लालच,
लोभ कपट गहराया है।
रिश्तों का सम्मान रहा नहीं,
माता का वध करवायाहै।।
इस लड़की ने बेटी शब्द का,
तार तार विश्वास किया।
साक्ष्य मिले हैं माता से पहले,
पिता का काम तमाम किया।।
न समझेंगी न सुधरेंगी,
होगा जबतक प्रतिकार नही।
इनकी खातिर मृत्युदंड से,
कम कुछ सजा स्वीकार नहीं।।
दुष्टता,धूर्तता और धृष्टता,
करती जा रही 'आखिर क्यों?'
नैतिकता,आदर्श, संस्कार,
शब्द ही रह गए, 'आखिर क्यों?'
लेखिका - इन्दिरा 'प्रबुद्ध' शर्मा
जयपुर (राजस्थान)
