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क्या अंधकार मिट पाएगा? 

 
क्या अंधकार मिट पाएगा? 
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काव्य व्यंग्य-अमित श्रीवास्तव 

जहाँ शिक्षा मंदिर कही जाती थी,
अब वहाँ आदेशों की सभा लगती है।
किताबों की खुशबू नहीं,
फाइलों की स्याही महकती है।

जिसे बच्चों को ज्ञान देना था,
उसे भेजा गया वहाँ,
जहाँ स्कूल नहीं, पहचान नहीं,
बस “कर्तव्य” का बहाना है।

वो चली — धूप में, थकान में,
क्योंकि सेवा उसका धर्म था,
पर यहाँ तो धर्म नहीं चलता,
बस “महोदय का मन” चलता है।

जो बोले — “मैंने मौखिक आदेश पर कार्य किया,”
उसे सुनना पड़ता है — “इनका लेटर बनवा दूँगा।”
वाह विभाग! जहाँ मेहनत नहीं,
मूड पर निर्णय होता है।

अब शिक्षा नहीं दी जाती,
बस औचित्य लिखा जाता है,
यहाँ शिक्षक नहीं चाहिए,
सिग्नेचर करने वाले योद्धा चाहिए।

तो बताइए…
 क्या अंधकार मिट पाएगा?